2026-02-06 13:22:25
भव्य खबर/ रमण श्रीवास्तव । राजधानी में बच्चों के लापता होने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. 27 जनवरी 2026 तक अपडेट किए गए दिल्ली पुलिस के मैनुअल के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ इस साल के पहले 27 दिनों में ही 191 बच्चे लापता हुए.
इनमें से 54 बच्चों को दिल्ली पुलिस ने बरामद कर लिया, लेकिन 137 बच्चे अब भी लापता हैं, जिनकी दिल्ली पुलिस तलाश कर रही है.
सबसे चिंताजनक स्थिति 12 से 18 वर्ष आयु वर्ग में दिख रही है. इस आयु वर्ग में 169 किशोर-किशोरियां लापता हुए, जिनमें लड़कियों की संख्या सबसे अधिक 138 है. यही वर्ग रिकवरी के बाद भी सबसे ज्यादा अनट्रेस्ड मामलों वाला है. 121 बच्चों की अब भी तलाश जारी है. यह संकेत देता है कि किशोर आयु वर्ग में विशेषकर लड़कियां सबसे ज्यादा जोखिम में हैं. इस साल 1 से 27 जनवरी तक 0 से 8 वर्ष आयु वर्ग में 9 बच्चे लापता हुए. इनमें से 3 बरामद हुए और 6 अभी तक नहीं मिले हैं. 8 से 12 वर्ष वर्ग में 13 बच्चे लापता हुए, 3 ट्रेस हुए और 10 अब भी गायब हैं. दिल्ली पुलिस इनकी तलाश में जुटी है. आंकड़ों से साफ है कि कम उम्र के बच्चों में संख्या कम है और रिकवरी रेट भी संतोषजनक नहीं है.
आपको बता दें कि ये आंकड़े और भी ज्यादा चिंता बढ़ाने वाले हैं। जानकारी के मुताबिक साढ़े चार हजार से अधिक किशोरियों समेत इस आयु वर्ग के कुल छह हजार से ज्यादा लड़के-लड़कियों का अब तक कोई सुराग नहीं लग पाया है। आशंका जताई जा रही है कि इनमें से कई किशोरियों की हत्या कर दी गई हो सकती है या फिर उन्हें जबरन मानव तस्करी और वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेल दिया गया हो। हालात सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एनसीआर के अन्य शहरों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं दिखाई देती। लगातार सामने आ रहे ये मामले बच्चों और किशोरियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं और कानून व्यवस्था के दावों की पोल खोलते नजर आते हैं।
50 हजार से ज्यादा लड़के-लड़कियां गायब
इन हैरान करने वाले आंकड़ों के सामने आने के बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने एक निजी चैनल से बात करते हुए कहा कि दिल्ली और एनसीआर के जिलों में हर साल नाबालिग बच्चों के गायब होने की खबर लगातार सामने आती रहती है। उन्होंने बताया कि पिछले दस साल में 50 हजार से अधिक नाबालिग गायब हुए हैं; इनमें केवल 37 हजार नाबालिग लड़कियां हैं।
15 दिन में 807 लोग गायब
देश की राजधानी दिल्ली में एक हैरान करने वाले तथ्य सामने आए है। दरअसल, साल 2026 की शुरूआत के महज 15 दिनों में ही दिल्ली से 800 से ज्यादा लोगों के लापता होने की शिकायतें दर्ज की गई हैं। 1 जनवरी से 15 जनवरी के बीच कुल 807 लोगों के गायब होने की सूचना मिली, यानी औसतन हर दिन करीब 54 लोग लापता हुए। इन मामलों में महिलाओं और लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा रही, जिनकी तादाद 509 बताई गई है, जबकि 298 पुरुष भी लापता हुए हैं। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि इस दौरान प्रतिदिन औसतन 13 बच्चे गायब हुए, जो हालात की गंभीरता को दशार्ता है।
दिल्ली पुलिस के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल लापता लोगों में 191 मामले नाबालिगों से जुड़े हैं, जिनमें 146 लड़कियां शामिल हैं, जबकि 616 मामले वयस्कों के हैं। पुलिस ने अब तक 235 लापता लोगों को खोज निकालने में सफलता पाई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि 572 लोग अब भी लापता हैं। ये आंकड़े राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक हालात को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
121 बच्चे, अभी भी लापता
पीटीआई की रिपोर्ट में बच्चों से जुड़े आंकड़े और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, लापता नाबालिगों में से पुलिस अब तक केवल 29 लड़कियों और 19 लड़कों का ही पता लगा सकी है, जबकि करीब 71 प्रतिशत किशोर, यानी 121 बच्चे, अभी भी लापता हैं। 8 से 12 वर्ष की आयु वर्ग में कुल 13 बच्चे गायब हुए थे, जिनमें आठ लड़के और पांच लड़कियां शामिल हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ तीन लड़कों को ही खोजा जा सका है। इसी तरह आठ साल से कम उम्र के बच्चों के मामलों में भी हालात गंभीर हैं, जहां कुल नौ बच्चों के लापता होने की सूचना मिली थी। इनमें से केवल तीन बच्चों का ही पता चल पाया है, जबकि छह मासूम अभी भी अपने परिवारों से दूर हैं, जो बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है। मिली जानकारी के अनुसार, लापता होने वालों में सबसे ज्यादा वयस्क बताए जा रहे हैं। आंकड़ों के हिसाब से जनवरी के पहले पखवाड़े में 616 वयस्क लापता हुए, जिनमें 363 महिलाएं और 253 पुरुष शामिल हैं। पुलिस ने 90 पुरुषों और 91 महिलाओं का पता लगा लिया है, लेकिन 435 वयस्क अब भी लापता हैं।
2025 में 24,508 लोग हुए थे लापता
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2025 में भी दिल्ली में लापता लोगों की संख्या बेहद चिंताजनक रही। इस दौरान राजधानी से कुल 24,508 लोगों के गायब होने की शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें महिलाओं की संख्या सबसे अधिक रही। कुल मामलों में 14,870 महिलाएं लापता हुईं, जो 60 प्रतिशत से भी ज्यादा है, जबकि 9,638 पुरुषों के लापता होने के मामले सामने आए। हालांकि पुलिस ने प्रयास करते हुए 15,421 लोगों को ढूंढने में सफलता हासिल की, लेकिन इसके बावजूद 9,087 मामले ऐसे रहे, जिनका अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा और लापता मामलों की जांच की प्रभावशीलता को लेकर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
क्या दिल्ली पुलिस ने जारी किया है गुमशुदगी के मामलों को लेकर कोई अलर्ट?
दिल्ली पुलिस की तरफ से ऐसा कोई अलर्ट जारी नहीं हुआ है. 15 दिन में 800 से ज्यादा गुमशुदगी के मामलों का आंकड़ा न्यूज एजेंसी ढळक की एक रिपोर्ट से आया है. यहीं से तमाम न्यूज रिपोर्ट्स में इस आंकड़े का इस्तेमाल ऐसे किया गया, जैसे इसे दिल्ली पुलिस ने किसी चेतावनी की तरह जारी किया हो.
दिल्ली पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट या फिर सोशल मीडिया अकाउंट पर हमें ऐसा कोई अलर्ट नहीं मिला. इस कथित अलर्ट की सच्चाई जानने के लिए हमने दिल्ली पुलिस से भी संपर्क किया.
दिल्ली पुलिस ने आधिकारिक तौर पर भी एक वीडियो जारी कर स्पष्टीकरण दिया है कि पिछले सालों की तुलना में इस साल गुमशुदगी के मामलों को लेकर कोई वृद्धि दर्ज नहीं हुई है.
अब सवाल ये उठता है कि दिल्ली पुलिस ने ये आंकड़े जारी नहीं किए हैं तो ये आंकड़े आए कहां से ?
दरअसल, 6 राज्यों की पुलिस का एक आधिकारिक पोर्टल है. जहां हर दिन दर्ज होने वाले गुमशुदगी के मामलों, अज्ञात शवों, आदतन अपराधियों, चोरी हुई गाड़ियों, चोरी हुए मोबाइल आदि का डेटा देखा जा सकता है. ये जानकारी कोई भी आम नागरिक ले सकता है. दिल्ली के अलावा, हरियाणा, पंजाब, चंदीगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश के आंकड़े भी इस पोर्टल पर देखे जा सकते हैं.
यहां गुमशुदगी के आंकड़े चेक किए, तो पता चला कि 1 जनवरी से 15 जनवरी 2026 के बीच दिल्ली में गुमशुदगी के 1056 मामले दर्ज किए गए. 831 लोगों को पुलिस ढूंढ नहीं पाई.
1 जनवरी 2026 से 15 जनवरी 2026 के बीच गुमशुदगी के 800 से ज्यादा मामले सामने आए ये दावा सच है.
क्या पहली बार दर्ज हुए इतने बड़े पैमाने पर गुमशुदगी के मामले ?
जिÞपनेट पोर्टल पर उपलब्ध हैं लापता लोगों की सूचनाएं
दिल्ली पुलिस द्वारा संचालित जिÞपनेट एक अत्यंत महत्वपूर्ण डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे लापता व्यक्तियों की तलाश और अज्ञात शवों की पहचान के लिए डिजाइन किया गया है। यह पोर्टल दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और चंडीगढ़ जैसे पड़ोसी राज्यों की पुलिस के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए एक साझा कड़ी का काम करता है। जिÞपनेट की मदद से लापता बच्चों, महिलाओं और अन्य व्यक्तियों का डेटा तुरंत आॅनलाइन उपलब्ध हो जाता है, जिससे विभिन्न राज्यों की पुलिस वास्तविक समय में एक-दूसरे के साथ समन्वय कर पाती है और बरामदगी की संभावना बढ़ जाती है।
आम नागरिकों के लिए भी यह पोर्टल एक सशक्त संसाधन है। जिÞपनेट पर कोई भी व्यक्ति लापता व्यक्तियों के फोटो, एफआईआर की स्थिति, चोरी हुए वाहनों का विवरण और अज्ञात शवों की जानकारी आसानी से देख सकता है। इसके अलावा, इस पोर्टल पर सर्च करने की सुविधा उपलब्ध है, जिससे लोग घर बैठे यह पता लगा सकते हैं कि उनके द्वारा रिपोर्ट किया गया व्यक्ति किसी पुलिस स्टेशन में मिला है या नहीं। यह तकनीक पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के साथ-साथ बिछड़े हुए परिवारों को फिर से मिलाने में एक जीवनरक्षक की भूमिका निभा रही है।
हमने पिछले 5 सालों के इस दौरान के गुमशुदगी के आंकड़े चेक किए. यानी 1 जनवरी से 15 जनवरी के बीच के.
1 जनवरी 2025 से 15 जनवरी 2025 के बीच - 922 गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए. 557 लोगों को पुलिस ढूंढ नहीं पाई.
1 जनवरी 2024 से 15 जनवरी 2024 के बीच - गुमशुदगी के कुल 989 मामले दर्ज हुए. 586 मामलों में पुलिस लोगों को ढूंढ नहीं पाई.
1 जनवरी 2023 से 15 जनवरी 2023 के बीच - 1258 लोगों की गुमशुदगी दर्ज हुई. इनमें से 725 लोगों को पुलिस ढूंढ नहीं पाई.
1 जनवरी 2022 से 15 जनवरी 2022 के बीच - 937 लोगों के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई.0 477 लोगों को पुलिस ढूंढ नहीं पाई.
1 जनवरी 2021 से 15 जनवरी 2021 के बीच 1088 लोगों के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज हुई. 556 लोगों को पुलिस ढूंढ नहींं पाई.
हर साल दर्ज होने वाले गुमशुदगी के मामलों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि पिछले 5 सालों में दिल्ली में सालाना 17,000 से लेकर 25 हजार के बीच लोग गुमशुदा होते हैं. ये आंकड़े साबित करने के लिए काफी हैं कि 2026 के पहले 15 दिनों में दर्ज हुए मामले अब तक के सर्वाधिक नहीं है. ये आंकड़े दिल्ली पुलिस की तरफ से ही जारी फळक टंल्ल४ं’ से लिए गए हैं.
2025 के आंकड़े अभी दिल्ली पुलिस या ठउफइ की तरफ से जारी नहीं हुए हैं.
इतने बड़े पैमाने पर गुमशुदगी के मामलों का दर्ज होना चिंताजनक है. ये सच है कि लोगों को सतर्क रहना चाहिए. पर न तो दिल्ली पुलिस ने इन मामलों पर कोई अलर्ट जारी किया है. न ही ऐसा पहली बार हुआ है कि 15 दिन में गुमशुदगी के 800 से ज्यादा मामले दर्ज हुए हों.
दिल्ली पुलिस चल रही आॅपरेशन मिलाप.........
दिल्ली पुलिस के पीआरओ का कहना है कि दिल्ली पुलिस लापता बच्चों के मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है. ह्यआॅपरेशन मिलापह्ण सहित विशेष अभियानों के तहत टीमें लगातार बच्चों की तलाश में जुटी हैं. सभी थानों को निर्देश है कि गुमशुदगी की सूचना मिलते ही तत्काल मामला दर्ज कर जांच शुरू की जाए. पोर्टल के जरिए अन्य राज्यों के डाटाबेस से मिलान किया जाता है. रेलवे स्टेशन, बस अड्डों व भीड़भाड़ वाले इलाकों में नियमित सर्च आॅपरेशन चलाए जाते हैं. एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट, सीसीटीवी विश्लेषण व तकनीकी निगरानी भी की जाती है. बरामद बच्चों के पुनर्वास के लिए उहउ व ठॠड२ के साथ समन्वय रखा जाता है. जो बच्चे नहीं मिल पाए हैं उनकी तलाश जारी है. अभिभावकों से भी अपील की जाती है कि वह भीड़भाड़ वाले स्थान पर बच्चों का हाथ पकड़ कर रखें और ख्याल रखें.
अलर्ट से जुड़े पोस्ट शेयर करने से पहले सावधान रहना क्यों जरूरी ?
ये सवाल उठ सकता है कि अगर 800 से ज्यादा लोगों के गुमशुदा होने का आंकड़ा सच है, तो फिर अलर्ट से जुड़ा पोस्ट शेयर करने में गलत क्या है ?
इसमें पहली बात तो गलत ये है कि दिल्ली पुलिस ने ऐसा कोई अलर्ट जारी नहीं किया है, लिहाजा ये एक फेक अलर्ट है. इससे ज्यादा जरूरी पहलू ये है कि अकसर चोरी, गुमशुदगी, किडनैपिंग से जुड़े मामलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना का काफी खतरनाक नुकसान समाज में देखने को मिलता है.
उदाहरण के तौर पर देखें, तो बच्चा चोरी की अफवाहों से जुड़े मामलों में ये सामने आया है. जब घटनाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया और खामियाजा बेकसूर लोगों को भुगतना पड़ा. वो लोग जिनका अपराध से कोई संबंध नहीं था उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ा.
पिछले साल भी ऐसा ही मामला उत्तरप्रदेश में भी सामने आया. जहां चोरी की कुछ मामूली घटनाओं को सोशल मीडिया पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया. नतीजा ये हुआ कि कई बेकसूर ग्रामीणों के साथ उत्तरप्रदेश के अलग-अलग गावों में हिंसा हुई.
ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की राजधानी में 15 दिन में 800 से ज्यादा लोगों का गुमशुदा होना अब एक आम आंकड़ा बन चुका है. पिछले 10 सालों में इन घटनाओं पर बड़े पैमाने पर लगाम लगती भी नहीं दिख रही. बड़ी संख्या में लोग ऐसे होते हैं जिनकी गुमशुदगी की गुत्थी पुलिस सुलझा ही नहीं पाती. पर इस मामले को जिस सनसनीखेज तरीके से फेक अलर्ट के साथ शेयर किया जा रहा है, वो एक नई समस्या पैदा कर सकता है, जैसा कि हमने बच्चा चोरी की घटनाओं से जुड़े मामलों में देखा है.