2026-03-25 16:08:23
समाज में सामाजिक न्याय को और सुदृढ करने की दिशा में सुप्रीमकोर्ट ने एक अहम निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को लेकर मंगलवार को एक बड़ा और काफी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने फैसले में कहा कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाता है तो उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। सुप्रीमकोर्ट ने आगे ये भी कहा कि किसी अन्य धर्म अपनाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से खत्म हो जाता है। सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने फैसला सुनाया कि किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने से अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा है कि धर्मांतरण करने वाला व्यक्ति एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का पात्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है।
पूरा मामला क्या है?
आइये ये समझते हैं कि पूरा मामला क्या है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से खो देता है। सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अगर कोई व्यक्ति उदाहरण के लिए ईसाई धर्म अपना लेता है और ईसाई धर्म के अनुसार जीवन जी रहा है तो उसे अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को पूरी तरह संवैधानिक बताया। कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक आदेश, 1950 में साफ कहा गया है कि खंड-3 में बताए गए धर्मों के अलावा किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर जन्म के बावजूद अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है। यह आदेश एक ऐसे व्यक्ति के मामले में दिया गया, जिसने ईसाई धर्म अपना लिया था और अब पेस्टर के तौर पर काम कर रहा है, लेकिन उसने कुछ लोगों के खिलाफ एससी-एसटी (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत मामला दर्ज कराया था। मामला दर्ज कराने वाले व्यक्ति ने एससी-एसटी कानून के तहत संरक्षण की मांग की थी। हालांकि जिन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया, उन्होंने इसे चुनौती दी और दावा किया कि पीड़ित ईसाई धर्म अपना चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा इस मामले में ये अहम नहीं है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में धर्मांतरित हो गया है या उसे उसके मूल समुदाय द्वारा स्वीकार किया गया है या नहीं। बल्कि सबूतों से ये सिद्ध होता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म का पालन करता है और एक दशक से अधिक समय से बतौर पादरी काम कर रहा है। वह गांव के घरों में नियमित तौर पर रविवार की प्रार्थनाएं आयोजित करता है। इस तथ्यों से इस बात में कोई शक नहीं है कि घटना के समय वह ईसाई बना रहा।
सुप्रीमकोर्ट ने साफ किया कि “1950 के आदेश के क्लॉज 3 में बताए गए धर्मों के अलावा किसी और धर्म को अपनाने पर जन्म की स्थिति चाहे जो भी हो, अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत खत्म हो जाता है। न्यायालय ने यह फैसला सुनाया, खंड 3 के तहत, कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है, वह संविधान या संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के तहत किसी भी वैधानिक लाभ, सुरक्षा, आरक्षण या अधिकार का दावा नहीं कर सकता और न ही उसे ये लाभ दिए जा सकते हैं। यह रोक पूरी तरह से लागू होती है और इसमें कोई अपवाद नहीं है। कोई भी व्यक्ति एक ही समय पर खंड-3 में बताई गई जाति के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने और उसका पालन करने के साथ-साथ अनुसूचित जाति की सदस्यता का दावा नहीं कर सकता।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था?
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पीड़ित व्यक्ति पर चल रहे एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को हटाने का आदेश दिया था। 30 अप्रैल 2025 को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति एससी-एसटी कानून के प्रावधानों का लाभ लेने का पात्र नहीं है। इसके बाद हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज धाराओं को खत्म करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ पेस्टर ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से समाज में असत्य उत्पीड़न की घटनाओं में कमी आएगी और सामाजिक न्याय की दिशा में ये निर्णय मील का पत्थर साबित होगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार : बृजेश कुमार द्विवेदी