2026-05-04 22:51:49
नई दिल्ली / भव्य खबर । पश्चिम बंगाल और असम के चुनावी नतीजों ने देश की राजनीति में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में सियासी इतिहास रचा है तो वही असम में फिर से पूर्ण बहुमत के साथ अपनी सरकार बनाने में सफलता हासिल की है।
लेकिन इन नतीजों के साथ ही विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इन चुनाव परिणामों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सीधे तौर पर चुनाव “चोरी” का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि असम और बंगाल दोनों ही ऐसे स्पष्ट उदाहरण हैं जहां भाजपा ने चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव को “चुराया” है। उन्होंने सिर्फ आरोप ही नहीं लगाए, बल्कि पश्चिम बंगाल में 100 से अधिक सीटों की “चोरी” के दावे पर खुलकर ममता बनर्जी का समर्थन भी किया। राहुल गांधी का यह बयान विपक्ष की एकजुटता और इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की रणनीति को साफ तौर पर दिखाता है।
राहुल गांधी ने अपने बयान में यह भी कहा कि यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि इससे पहले भी यही “प्लेबुक” कई चुनावों में अपनाई जा चुकी है। उन्होंने मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और 2024 के लोकसभा चुनावों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का यह एक पैटर्न बन चुका है। उनका संदेश स्पष्ट था—यह सिर्फ एक राज्य या एक चुनाव का मामला नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है।
उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी बेहद आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि 100 से ज्यादा सीटें भाजपा ने “लूट” ली हैं और चुनाव आयोग अब निष्पक्ष संस्था नहीं रह गई, बल्कि “भाजपा का आयोग” बन चुकी है। उन्होंने कहा कि यह जीत नैतिक नहीं बल्कि पूरी तरह अनैतिक है। ममता बनर्जी ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की मिलीभगत से यह सब हुआ, और इसे उन्होंने “पूरी तरह अवैध” करार दिया। उनके शब्दों में, “यह जीत नहीं, बल्कि लूट है।”
ममता बनर्जी के इन आरोपों को जब राहुल गांधी का खुला समर्थन मिला, तो यह विवाद और अधिक गहरा गया। अब यह सिर्फ राज्य स्तरीय राजनीतिक बयानबाजी नहीं रह गई, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र, चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बहस का मुद्दा बन चुका है।
असम में भाजपा की निर्णायक जीत और पश्चिम बंगाल में पहली बार बहुमत के साथ सरकार बनाने के दावे ने जहां सत्तारूढ़ दल के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि का माहौल बनाया है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा बता रहा है। “चुनाव चोरी” और “संस्था कब्जाने” जैसे आरोपों ने राजनीतिक माहौल को बेहद गरमा दिया है।
आने वाले समय में यह टकराव और तेज होने के संकेत हैं, क्योंकि विपक्ष अब इस मुद्दे को संभव है सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि इसे लोकतंत्र की रक्षा के बड़े सवाल के रूप में पेश कर सकती है। वहीं सत्तापक्ष इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर अपनी जीत को जनता का स्पष्ट जनादेश बता रहा है। ऐसे में देश की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी नतीजों से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगे हैं।