2025-03-19 13:15:43
नई दिल्ली/ भव्य खबर/ एजेंसी/ रमण श्रीवास्तव । भारतीय मूल की अमेरिकी एस्ट्रोनॉट सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 9 महीने 14 दिन बाद पृथ्वी पर लौट आए हैं। इनके साथ क्रू-9 के दो और एस्ट्रोनॉट अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी हैं। उनका ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट भारतीय समयानुसार 19 मार्च को सुबह 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर लैंड हुआ। ये चारों एस्ट्रोनॉट मंगलवार (18 मार्च) को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से रवाना हुए थे। स्पेसक्राफ्ट के धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने पर इसका तापमान 1650 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो गया था। इस दौरान करीब 7 मिनट के लिए कम्युनिकेशन ब्लैकआउट रहा, यानी यान से संपर्क नहीं रहा। आपको बता दे कि बीते साल जून में महज़ आठ दिनों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर गए ये दोनों एस्ट्रोनॉट नौ महीनों बाद लौट पाए हैं. बोइंग का जो स्टारलाइनर यान उन्हें वापस धरती पर लाने वाला था वो ख़राब हो गया था इसलिए उन्हें इतना लंबा इंतज़ार करना पड़ा. उन्हें आख़िरकार एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स का ड्रैगन कैप्सूल फ्लोरिडा के तट पर सुरक्षित रूप से उतारा. समुद्र में गिरने के बाद कैप्सूल के चारों ओर जिज्ञासु डॉल्फिनों का एक समूह चक्कर लगा रहा था. अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस स्टेशन से धरती पर पहुँचने में 17 घंटों का लंबा वक्त लगा. ये यात्रा और कैप्सूल के स्पलैशडाउन करने के बाद क्या-क्या हुआ? भारतीय समयानुसार तड़के 3 बजकर 27 मिनट पर चार अंतरिक्ष यात्रियों को लाने वाला कैप्सूल फ़्लोरिडा के तट के पास समंदर में गिरा. समंदर के सतह पर आने के बाद कंट्रोल सेंटर की ओर से अंतरिक्ष यात्रियों का स्वागत करते हुए कहा गया, निक, एलेक, बुच, सुनी..स्पेसएक्स की ओर से घर वापस आने का स्वागत है. कमांडर निक हेग ने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए जवाब दिया, कैप्सूल में सभी के चेहरे पर मुस्कुराहटों से भरा है. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) से पृथ्वी तक आने का सफ़र लगभग 17 घंटे का था. पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय ड्रैगन कैप्सूल की रफ़्तार 17000 मील प्रति घंटा थी जिसे कुछ मिनटों के अंतराल में तेज़ी से धीमा किया गया. इससे पहले मंगलवार को सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर के साथ दो और अंतरिक्ष यात्री निक हेग और रूसी अंतरिक्ष यात्री लेग्ज़ेंडर गोर्बूनोव ने बाकी अंतरिक्ष यात्रियों से विदा लिया था. निक हेग और गोर्बूनोव पिछले साल सितंबर में स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल के ज़रिए छह महीने के अंतरिक्ष मिशन पर आईएसएस पर पहुंचे थे. जब कैप्सूल धरती के वायुमंडल में प्रवेश किया तो कम्युनिकेशन ब्लैकआउट हो गया था जोकि क़रीब तीन बजकर 20 मिनट पर फिर से बहाल हुआ. वायुमंडल में प्रवेश के बाद अंतरिक्ष यान के प्लाज़्मा शील्ड का तापमान 1927 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था लेकिन हीट शील्ड सवार अंतरिक्ष यात्रियों को इतनी तेज़ गर्मी से बचाने में मददगार साबित हुई. क़रीब 3 बजकर 21 मिनट पर अंतरिक्षयान ऑटोनोमस यानी स्वचालित हो गया था, यानी अंतरिक्ष यात्री इसे नियंत्रित नहीं कर रहे थे. इस दौरान उनके सामने लगे टच स्क्रीन पर वे सारी गतिविधियों को देख पा रहे थे. क़रीब तीन बजकर 24 मिनट पर पहले ड्रैगन कैप्सूल के दो पैराशूट खुले जिससे इसकी रफ़्तार और धीमी हो गई. इस दौरान एक ज़ोर का झटका लगा और कैप्सूल की रफ़्तार और धीमी हो गई. इसके बाद दो और पैराशूट खुले. जिस समय कैप्सूल समंदर में उतरा, उसके ठीक बाद ही पानी में कैप्सूल के चारों ओर डॉल्फ़िन चक्कर लगाती हुई तैरती दिखीं. मौके पर मौजूद रिकवरी टीम फास्ट बोट्स से कैप्सूल तक पहुंची और पहले सुरक्षा का जायजा लिया और पैराशूट हटाया. इसके बाद स्पेसएक्स का रिकवरी पोत पहुंचा, जोकि लैंडिंग साइट से दो मील ही दूर पर रुका हुआ था. जिस समय अंतरिक्ष यान की वापसी हो रही थी, आसमान पूरी तरह साफ़ नीला था. इसके बाद रस्सियों के सहारे कैप्सूल को सुरक्षा नाव में लाया गया. इसके बाद ड्रैगन का साइड हैच खुला और सारी दुनिया अंतरिक्ष यात्रियों की झलक पाने का इंतज़ार करने लगी. अरसे बाद ये लोग पृथ्वी पर ताज़ा हवा में सांस लेने वाले हैं. इसके बाद नासा की लाइव तस्वीरों के ज़रिए दुनिया भर में लोगों ने सुनीता विलियम्स और उनके साथियों को बाहर निकलते देखा. क्रू के कैप्सूल से निकलने से पहले एक कैमरे ने अंदर की तस्वीरें खींची. इन तस्वीरों में सभी यात्री हाथ हिला कर अभिवादन करते दिखे. क्रू-9 के कमांडर निक हेग ड्रैगन से बाहर निकलने वाले पहले यात्री थे. वो बाहर निकले, कैमरे की ओर देखकर मुस्कुराए, हवा में हाथ लहराए और आगे निकल गए. कैप्सूल से निकलने से ठीक पहले सुनीता विलियम्स और विलमोर ने कैमरे की ओर हवा में हाथ हिलाकर ख़ुशी ज़ाहिर की. अंतरिक्ष में क़रीब 286 दिन बिताने के बाद सुनीता विलियम्स और बुच विलमोर ने धरती पर ताज़ा हवा में सांस ली. जिस समय वे कैप्सूल से बाहर आ रहे थे उनके चेहरे पर मुस्कान तैर रही थी और कैमरे की ओर देखकर वे लगातार हाथ हिला रहे थे. क़रीब नौ महीने तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहते हुए इन दोनों यात्रियों ने हर दिन 16 बार सूर्योदय और सूर्यास्त देखा और अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इससे तालमेल बिठाना उनके लिए कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा. नासा के कॉमर्शियल क्रू प्रोग्राम के मैनेजर स्टीव स्टिच ने बताया कि अंतरिक्ष यात्रियों की सेहत ठीक है. उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष यात्री कुछ समय के लिए रिकवरी शिप पर रहेंगे और फिर उन्हें ह्यूस्टन ले जाया जाएगा. उन्होंने अपनी टीम का शुक्रिया कहा और नासा की ज़रूरतों के मुताबिक खुद को ढालने के लिए अमेरिकी अरबपति एलमस्क की कंपनी स्पेसएक्स की तारीफ़ की. हालांकि अंतरिक्ष यात्रियों का मेडिकल चेकअप किया जा रहा है और जब यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी इसके बाद परिवार से मिलने की इजाज़त मिलेगी. आम तौर पर इसमें एक दिन का समय लगता है. स्टीव स्टिच ने कहा कि वे अंतरिक्ष में रहते हुए बिताए गए अपने समय के बारे में बात करेंगे और फिर छुट्टी पर चले जाएंगे. नासा स्पेस ऑपरेशन मिशन डायरेक्टर्स के डिप्टी एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर्स जोएल मोंटालबानो ने कहा कि सुनी और बुच ने आईएसएस पर रहते हुए 900 घंटों तक रिसर्च किया और इस दौरान 150 वैज्ञानिक प्रयोग किए. उन्होंने नासा अंतरिक्ष यात्रियों के किए गए प्रयोगों को देश के लिए लाभदायक बताया और उम्मीद जताई कि इस दशक के अंत तक मंगल ग्रह पर इंसान उतारने के नासा के लक्ष्य में ये मददगार साबित होंगे. इसरो के पूर्व साइंटिस्ट डॉ. विनोद कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, 2022 में नेचर मैगजीन में कनाडा की एक रिसर्च छपी. ओटावा यूनिवर्सिटी की इस स्टडी में कहा गया कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान एस्ट्रोनॉट्स के शरीर की 50 फीसदी लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और मिशन के चलने तक ऐसा होता रहता है। यानी शरीर में खून की कमी हो जाती है. इसे स्पेस एनीमिया कहा जाता है. ये लाल कोशिकाएं पूरे शरीर को ऑक्सीजन पहुंचाती हैं. इसी वजह से चांद, मंगल या उससे दूर की अंतरिक्ष यात्राएं करना एक बड़ी चुनौती हैं. हालांकि, ऐसा किस वजह से होता है, ये अब तक एक राज ही है. इसके अलावा, अंतरिक्ष में रहने के दौरान यात्रियों की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं और हड्डियों में कैल्शियम की कमी हो जाती है. धरती पर लौटने के बाद अंतरिक्ष यात्री कमजोर और थका हुआ महसूस करते हैं. सुनीता के अंतरिक्ष से धरती पर कदम रखने के साथ ही वह कुल 286 दिन अंतरिक्ष में बिताने वाली हस्ती बन गई हैं. इसके साथ ही वह एक यात्रा में तीसरी सबसे ज्यादा दिन तक आईएसएस पर बिताने वाली महिला वैज्ञानिक बन गई हैं. इस मामले में सबसे पहले नंबर पर 328 दिनों के साथ क्रिस्टीना कोच हैं. वहीं, पिग्गी वीटस्न 289 दिनों के साथ दूसरे नंबर पर हैं. आईएसएस में एक बार में सबसे ज्यादा 371 दिन अंतरिक्ष यात्री फ्रैंक रूबियो ने बिताए हैं. कुल मिलाकर सबसे ज्यादा दिन बिताने का रिकॉर्ड 675 दिनों के साथ पिग्गी वीटस्न के पास है. विनोद श्रीवास्तव बताते हैं कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर में हर एक सेकेंड में 30 लाख लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं. वहीं, जमीन पर यह रफ्तार प्रति सेकेंड दो लाख ही है. हालांकि, अंतरिक्ष के मुकाबले धरती पर हर सेकंड इंसान की 2 लाख लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट होती हैं. जमीन में शरीर इसकी भरपाई कर लेता है क्योंकि शरीर धरती के हिसाब से विकसित हुआ है. कई रिपोर्ट के अनुसार, सुनीता और बुच को जिन स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, उनमें बेबी फीट (एक ऐसी स्थिति जिसमें अंतरिक्ष यात्री अपने तलवों की मोटी त्वचा खो देते हैं), खराब दृष्टि, चलने में कठिनाई और चक्कर आना शामिल हैं. इसमें कहा गया है कि अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी पर जीवन के लिए अपने रोजाना के कामकाज को फिर से करने में कई हफ्ते लग सकते हैं. ह्यूस्टन स्थित बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ने नोट किया है कि एक बार जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर लौटते हैं, तो उन्हें तुरंत पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में वापस समायोजित होने के लिए मजबूर होना पड़ता है, और उन्हें खड़े होने, अपनी निगाह को स्थिर करने, चलने और मुड़ने में समस्या हो सकती है. NASA के अनुसार, अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी से अक्सर हड्डियों के घनत्व में भारी कमी भी हो जाती है. अंतरिक्ष में हर महीने, अगर अंतरिक्ष यात्री इस कमी को दूर करने के लिए सावधानी नहीं बरतते हैं, तो उनकी वजन सहन करने वाली हड्डियों के घनत्व में एक प्रतिशत की कमी हो जाती है. यानी हड्डियां खोखली होकर कमजोर होने लगती है. इन प्रॉब्लम्स से निपटने के लिए ISS पर अंतरिक्ष यात्री इसीलिए एक्सरसाइज करते रहते हैं। अंतरिक्ष यात्रियों को शून्य गुरुत्वाकर्षण में होने वाली हड्डी और मांसपेशियों को कमजोर होने से बचाने के लिए ट्रेडमिल या स्थिर साइकिल का इस्तेमाल करवाया जाता है. हर दिन उन्हें वहां पर 2 घंटे एक्सरसाइज करना पड़ता है. ऐसा नहीं करने पर अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष में महीनों तक तैरने के बाद पृथ्वी पर लौटने पर चलने या खड़े होने में असमर्थ होंगे. पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी का ब्लड सर्कुलेशन, संतुलन और हड्डियों के घनत्व पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है. पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों को शरीर के निचले हिस्से में खींचता है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता का अनुभव करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में ये तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे वे फूले हुए दिखते हैं। इसके अलावा, कानों पर भी असर पड़ता हैपृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी का ब्लड सर्कुलेशन, संतुलन और हड्डियों के घनत्व पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है. पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों को शरीर के निचले हिस्से में खींचता है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता का अनुभव करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में ये तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे वे फूले हुए दिखते हैंपृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी का ब्लड सर्कुलेशन, संतुलन और हड्डियों के घनत्व पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है. पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों को शरीर के निचले हिस्से में खींचता है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता का अनुभव करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में ये तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे वे फूले हुए दिखते हैं. इसके अलावा, कानों पर भी असर पड़ता हैपृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है. अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण की कमी का ब्लड सर्कुलेशन, संतुलन और हड्डियों के घनत्व पर भी बड़ा प्रभाव पड़ता है. पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों को शरीर के निचले हिस्से में खींचता है, लेकिन अंतरिक्ष में भारहीनता का अनुभव करने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर के ऊपरी हिस्सों में ये तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे वे फूले हुए दिखते हैं। इसके अलावा, कानों पर भी असर पड़ता है. इसके अलावा, कानों पर भी असर पड़ता है.