2025-03-23 17:01:45
जब भगत सिंह ने यह बात कही थी, तब वे सिर्फ़ 23 वर्ष के थे। वहीं, गांधी जी कहते थे— अहिंसा सबसे बड़ी शक्ति है, जो किसी भी हथियार से अधिक प्रभावशाली है। एक ओर जोश, बलिदान और क्रांति थी, तो दूसरी ओर धैर्य, शांति और सत्याग्रह। दोनों के रास्ते अलग थे, लेकिन मंज़िल एक ही थी—भारत की स्वतंत्रता। आज का युवा अक्सर भगत सिंह को महात्मा गांधी से ऊपर मानता है। क्यों? क्या गांधी जी का रास्ता गलत था? या भगत सिंह का बलिदान ही असली स्वतंत्रता का मार्ग था? यह समझना जरूरी है कि स्वतंत्रता संग्राम में इन दोनों महापुरुषों की भूमिका क्या थी और आज के भारत को किसकी सीख की सबसे अधिक आवश्यकता है।
भारत को स्वतंत्रता चाहिए थी, लेकिन यह कैसे मिले—इस पर मतभेद थे। गांधी जी का रास्ता सत्य और अहिंसा का था। जब जलियांवाला बाग़ हत्याकांड हुआ, तो उन्होंने हिंसा के बदले असहयोग आंदोलन छेड़ा। जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर कर लगाया, तो उन्होंने 1930 में 240 मील पैदल चलकर दांडी यात्रा की और कानून तोड़ा। 1942 में जब उन्होंने अंग्रेज़ों भारत छोड़ो का नारा दिया, तो पूरा देश उनके पीछे खड़ा था। वे जानते थे कि अगर हिंसा से भारत स्वतंत्र भी हो गया, तो वह लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा।
दूसरी ओर, भगत सिंह को विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार कभी अहिंसा से डरकर भारत छोड़ने वाली नहीं है। 1928 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी, क्योंकि उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेना जरूरी समझा। 1929 में उन्होंने संसद में बम फेंका, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया, क्योंकि उनका उद्देश्य हिंसा नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार को जगाना था। जेल में रहकर उन्होंने किताबें पढ़ीं, लेख लिखे और मैं नास्तिक क्यों हूँ जैसी क्रांतिकारी रचनाएँ दीं। वे मानते थे कि अगर अंग्रेज़ों को भय नहीं होगा, तो वे भारत पर हमेशा राज करते रहेंगे।
आज की युवा पीढ़ी भगत सिंह को इसलिए पसंद करती है, क्योंकि उनकी कहानी जोश से भरी है। 23 साल की उम्र में जब लोग करियर बनाते हैं, तब भगत सिंह ने हंसते-हंसते फाँसी को गले लगाया। वे अपने परिवार से नहीं मिले, क्योंकि वे भावनात्मक रूप से कमजोर नहीं पड़ना चाहते थे। जब उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने कहा— मैं सिर्फ़ आज़ादी चाहता हूँ। दूसरी ओर, गांधी जी की अहिंसा धीमी थी, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। उन्होंने 1947 तक लड़ाई लड़ी, पर हार नहीं मानी। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए खुद को दांव पर लगा दिया। उनकी हत्या के समय भी उनके अंतिम शब्द थे— हे राम! अगर भगत सिंह ज्वालामुखी थे, तो गांधी जी एक नदी—दोनों का प्रभाव अमर है।
युवा भगत सिंह को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि वे तत्काल बदलाव चाहते हैं। वे अन्याय को सहन नहीं कर सकते और क्रांति का विचार उन्हें लुभाता है। लेकिन क्या सिर्फ़ जोश से देश बदलता है? अगर आज भगत सिंह होते, तो वे भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, जातिवाद और नेताओं की स्वार्थी राजनीति से सबसे पहले लड़ते। लेकिन क्या सिर्फ़ हिंसा से यह सब ठीक हो जाता? अगर गांधी जी होते, तो वे सामाजिक सुधारों, शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर जोर देते। इसलिए हमें दोनों की जरूरत है। भगत सिंह से हमें सीखना चाहिए कि अन्याय सहना गलत है और बदलाव के लिए आगे आना जरूरी है। वहीं, गांधी जी से हमें यह समझना चाहिए कि बदलाव केवल क्रांति से नहीं, बल्कि चरित्र और धैर्य से भी आता है।
क्रांति का मतलब केवल बंदूक उठाना नहीं, बल्कि सोच बदलना है। भगत सिंह ने भी कहा था, क्रांति से मेरा आशय है—अन्याय का अंत और एक नए समाज की रचना। आज अगर वे होते, तो वे शिक्षा, विज्ञान और समानता के लिए लड़ते। वहीं, गांधी जी का अहिंसा मार्ग कायरता नहीं था, बल्कि अंग्रेजों को झुकाने का सबसे बड़ा तरीका था। जब 1947 में अंग्रेज़ों ने भारत छोड़ा, तो बिना किसी युद्ध के! नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग और कई विश्व नेताओं ने गांधी जी के मार्ग को अपनाया।
अगर अन्याय हो, तो हमें भगत सिंह की तरह लड़ना चाहिए। अगर समाज में बदलाव लाना हो, तो गांधी जी की तरह धैर्य रखना चाहिए। अगर भ्रष्टाचार से लड़ना हो, तो भगत सिंह के साहस और गांधी जी की नीति—दोनों को अपनाना चाहिए।
भगत सिंह भी सही थे और गांधी जी भी। एक ने हमें बताया कि बलिदान के बिना स्वतंत्रता नहीं मिलती, तो दूसरे ने सिखाया कि संयम और धैर्य ही असली शक्ति है। आज के युवा को जोश चाहिए, लेकिन वह सही दिशा में हो। नफ़रत और हिंसा से बदलाव नहीं आता, बल्कि ज्ञान, साहस और धैर्य से समाज बदलता है। भगत सिंह और गांधी जी का मार्ग अलग था, लेकिन मंज़िल एक ही थी—एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर भारत। इसलिए, न भगत सिंह को भूलें, न गांधी जी को। दोनों को समझें और एक नए भारत के निर्माण में योगदान दें।
लेखक : राजेश श्रीवास्तव