मालदा हिंसा और कठघरे में ममता बनर्जी

मालदा हिंसा केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संकेत है कि कानून-व्यवस्था, राजनीतिक जवाबदेही और सामाजिक सौहार्द-तीनों को संतुलित रखना कितना आवश्यक है।
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2026-04-05 14:48:59

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के अब तक के शासन काल में कानून-व्यवस्था, मौलिक अधिकारों, मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों को तिरोहित करने की अनेकानेक घटनाएँ सामने आती हैं। हाल ही में मालदा के कालियाचक में हुई हिंसा और 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना अत्यंत निंदनीय है। इन अधिकारियों में तीन महिला अधिकारी भी शामिल थीं। हालात उस समय और गंभीर हो गए जब अधिकारियों को बाहर भी नहीं जाने दिया गया। देर रात पुलिस और केंद्रीय बलों की मदद से सभी को सुरक्षित बाहर निकाला गया। इस घटना से पता चलता है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते अपराधी बेलगाम हो गए हैं। अभी तक टीएमसी के विरोधी दलों को निशाना बनाया जाता था लेकिन अब न्यायिक अधिकारियों को भी नहीं बक्शा जा रहा है। एनआईए घटना की जांच कर रही है अब तक 35 अपराधियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस घटना का मास्टरमाइंड और मुख्य आरोपी मुफकिरुल इस्लाम भी गिरफ्तार हो चुका है, जो विदेश भागने की फिराक में था। मालदा की इस घटना ने चुनावी माहौल में राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह घटना 2026 विधानसभा चुनाव से पहले इस क्षेत्र में मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए की गई है। योजना पूरी साजिश के तहत की गई है। मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ममता बनर्जी किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहती हैं। मालदा हिंसा केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संकेत है कि कानून-व्यवस्था, राजनीतिक जवाबदेही और सामाजिक सौहार्द—तीनों को संतुलित रखना कितना आवश्यक है। इन सभी पहलुओं पर ममता बनर्जी अभी तक पूरी तरह असफल ही रही हैं।

2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह की हिंसा की खबरें सामने आईं, उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। चुनाव परिणामों के तुरंत बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों से राजनीतिक हिंसा, तोड़फोड़ और लोगों के पलायन तक की घटनाएं सामने आईं। राज्य सरकार के विरोधी दलों के समर्थकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। उनके मकान, दुकान जलाए गए, बड़े पैमाने पर हिंदुओं को पलायन होने पर विवश होना पड़ा। राज्य प्रशासन संवेदनशील हालात को संभालने में पर्याप्त रूप से एक पक्षीय और निष्प्रभावी रहा है।किसी भी लोकतंत्र में चुनाव से पहले और चुनाव के बाद हिंसा का होना अपने आप में चिंता का विषय है। यह केवल राजनीतिक दलों के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि आम नागरिकों के सुरक्षा अधिकार से भी जुड़ा विषय है। सुरक्षा की कसौटी पर पश्चिम बंगाल में ममता सरकार पूरी तरह असफल रही है। अब जब वहां की जनता विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा फैसला सुनाने जा रही है तब ममता बनर्जी की बौखलाहट दृष्टिगत हो रही है।

ममता बनर्जी के राज में हुए पंचायत चुनाव, विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनावों में अब तक की हिंसा में सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। इसका जिम्मेदार कौन है ? इसकी जवाबदेही अगर ममता बनर्जी की नहीं है तो फिर किसकी है ? पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा की घटनाओं को देखते हुए चुनाव आयोग ने राज्य में चुनाव के बाद भी केंद्रीय सुरक्षा बलों की पांच सौ कंपनियों की तैनाती का फैसला लिया है। ये कंपनियां चुनाव के बाद भी राज्य में तैनात रहेंगी ताकि टीएमसी के अपराधी इस बार हिंसा का ताण्डव नहीं कर पाएंगे। चुनाव आयोग ने यह फैसला अपने पिछले अनुभवों के आधार पर लिया है, क्योंकि राज्य में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा में 25 लोगों की मौतें हुई, जबकि आठ सौ से अधिक लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए है। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भी हुई हिंसा में करीब सात लोगों की मौतें और करीब सात सौ लोग घायल हुए थे। आयोग से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार राज्य में चुनाव बाद हिंसा के अनुभव को देखते हुए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का यह फैसला लिया गया है। आयोग ने इसके साथ ही ईवीएम मशीनों को रखे जाने वाले स्ट्रांग रूम और मतगणना केंद्रों की सुरक्षा के लिए भी केंद्रीय सुरक्षा बलों की दो सौ कंपनियों की तैनाती के भी निर्देश दिए है।राज्य के कानून व्यवस्था की खराब स्थिति को देखते हुए आयोग ने यह जरूरी कदम उठाए है। वहीं आयोग से जुड़े अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक दो चरणों में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव को शांतिपूर्ण कराने के लिए राज्य में केंद्रीय सुरक्षा बलों की 24 सौ कंपनियां की तैनाती दी गई है। ये दोनों चरणों में चुनाव वाले दिन मतदान केंद्रों पर तैनात रहेगी। गौरतलब है कि बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान है। पुलिस सुरक्षा में चलने वाले तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुरक्षा की नए सिरे से समीक्षा होगी। जिन्हें किसी तरह का कोई खतरा नहीं है, उनकी सुरक्षा हटाई जा सकती है। राज्य के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वह सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों की सुरक्षा की अगले दो से तीन दिनों के भीतर प्रोफेशनल ढंग से नए सिरे से समीक्षा करें। सूत्रों के मुताबिक चुनाव की घोषणा के पहले राज्य में तृणमूल कांग्रेस से सीधे जुड़े 832 लोगों व पार्टी समर्थक 144 लोगों को सुरक्षा दी गई थी। जिनकी सुरक्षा में 2185 पुलिस जवान तैनात किए गए थे। अब इसकी समीक्षा हो रही है।

अधिकतर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पश्चिम बंगाल को इस समय सबसे अधिक जरूरत है—मजबूत और निष्पक्ष प्रशासन, तेज न्यायिक प्रक्रिया और दृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति की,ताकि हिंसा की घटनाओं पर सख्ती से रोक लगाई जा सके। साथ ही, पीड़ितों को न्याय और सुरक्षा का भरोसा दिलाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है और ये काम ममता बनर्जी के शासनकाल में संभव होता नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए बंगाल की जनता अब बदलाव चाहती है और यही बात ममता को सबसे ज्यादा अखर रही है, इसलिए उनकी पार्टी के पाले हुए अपराधी मुस्लिम ध्रुवीकरण करने की घटनाओं को बेखौफ अंजाम दे रहे हैं। बंगाल में हिंदुओं और महिलाओं से जुड़ा सुरक्षा का विषय किसी एक दल या नेता की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की लोकतांत्रिक सेहत से जुड़ा प्रश्न है। ममताराज में संवैधानिक मूल्यों पर बड़ा संकट है। मानवाधिकारों पर संकट है। राज्य की जनता ममता के शासन से अब परेशान हो चुकी है इसलिए अब वो बदलाव चाहती है।

लेखक : बृजेश कुमार द्विवेदी (वरिष्ठ पत्रकार)

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