भारत–ईयू एफटीए दो अरब उपभोक्ताओं का बाज़ार

77 वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना भी इसी व्यापक संकेत-भाषा का हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि भारत यूरोप को केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन में एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में देख रहा है।
News

2026-01-29 10:13:57

भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता केवल दो आर्थिक इकाइयों के बीच टैरिफ घटाने या बाज़ार खोलने का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति, उभरते भू-आर्थिक समीकरणों और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ते संक्रमण का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। 27 जनवरी को इस समझौते की औपचारिक घोषणा की संभावना ने इसे केवल एक व्यापारिक घटना नहीं रहने दिया, बल्कि इसे रणनीतिक, कूटनीतिक और राजनीतिक महत्व से भर दिया है। भारत द्वारा अपने 77 वें गणतंत्र दिवस पर यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना भी इसी व्यापक संकेत-भाषा का हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि भारत यूरोप को केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन में एक महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में देख रहा है। मुक्त व्यापार समझौते की अवधारणा मूलतः आर्थिक उदारीकरण से जुड़ी है, जिसके तहत दो पक्ष एक-दूसरे के बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही को सरल बनाते हैं। शुल्कों में कटौती, गैर-शुल्क बाधाओं को कम करना और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना इसके प्रमुख तत्व होते हैं। भारत और यूरोपीय संघ के बीच यदि यह समझौता पूर्ण रूप से लागू होता है, तो भारतीय उत्पादों को यूरोप के 27 देशों के विशाल और समृद्ध बाज़ार में कम या शून्य टैरिफ पर प्रवेश मिलेगा, वहीं यूरोपीय वस्तुएं भारतीय बाज़ार में अपेक्षाकृत आसान पहुंच बना सकेंगी। यह परस्पर निर्भरता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि तकनीक, निवेश, आपूर्ति शृंखला और रोज़गार के क्षेत्रों में भी इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन द्वारा दावोस में दिए गए बयान ने इस समझौते को एक नए विमर्श में स्थापित किया है। उनका यह कहना कि यूरोपीय संघ को भारत के साथ इस स्तर का समझौता कर ‘फर्स्ट मूवर एडवांटेज’ मिलेगा, इस बात को रेखांकित करता है कि यूरोप भारत को भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक केंद्रीय स्तंभ मान रहा है। दो अरब उपभोक्ताओं का संयुक्त बाज़ार, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक चौथाई प्रतिनिधित्व करता है, केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, यह उस आर्थिक शक्ति का संकेत है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक व्यापार की दिशा तय कर सकती है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आ रहा है, जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था अस्थिरता और अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। अमेरिका, जो लंबे समय तक मुक्त व्यापार और वैश्वीकरण का समर्थक रहा, अब संरक्षणवादी रुझानों की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। भारत पर 50 प्रतिशत तक के टैरिफ का दबाव, व्यापार समझौते पर सहमति न बन पाना और रणनीतिक मुद्दों पर बढ़ती खींचतान ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को जटिल बना दिया है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार होने के बावजूद, व्यापार सरप्लस भारत के पक्ष में होने के कारण उस पर लगातार दबाव बना रहा है। इसका प्रत्यक्ष असर भारतीय निर्यातकों, विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर पड़ रहा है। यूरोप भी इसी प्रकार के दबावों से गुजर रहा है। यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा संकट, महंगाई और सुरक्षा चिंताओं से जूझ रहा यूरोप अब अमेरिकी राजनीति के नए रुख से भी असहज है। ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों पर अमेरिकी नेतृत्व की आक्रामक बयानबाज़ी और टैरिफ की धमकियां यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं कि उसे अपने आर्थिक और रणनीतिक विकल्पों में विविधता लानी होगी। ऐसे में भारत यूरोप के लिए केवल एक बड़ा बाज़ार नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में उभरता है। भारत के दृष्टिकोण से देखें तो यह समझौता आत्मनिर्भरता और वैश्विक एकीकरण के बीच संतुलन साधने की कोशिश का हिस्सा है। भारत पिछले कुछ वर्षों से मुक्त व्यापार समझौतों को लेकर अत्यंत सतर्क रहा है। अतीत में किए गए कुछ समझौतों के अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बाज़ार खोलना घरेलू उद्योगों और कृषि क्षेत्र के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यही कारण है कि कृषि उत्पाद भारत के लिए लंबे समय से एक ‘रेड लाइन’ रहे हैं। अमेरिका सहित कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा भारतीय कृषि बाज़ार तक अधिक पहुंच की माँग को भारत ने लगातार संतुलित और सतर्क दृष्टिकोण से देखा है। भारत की यह हिचकिचाहट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ से भी जुड़ी है। भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि आजीविका, संस्कृति और सामाजिक संरचना का आधार है। लाखों छोटे और सीमांत किसान, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है, न केवल अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति भी हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र को अचानक वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना सामाजिक असंतोष और राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है। यही कारण है कि न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के साथ समझौतों में भी भारत ने यह स्पष्ट किया कि किसानों के हितों की रक्षा उसकी प्राथमिकता रहेगी। यूरोपीय संघ पहले से ही भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। 2023–24 के वित्त वर्ष में 137.4 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार इस बात का प्रमाण है कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं पहले से ही गहराई से जुड़ी हुई हैं। प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता इस संबंध को संस्थागत रूप देकर और अधिक सुदृढ़ कर सकता है। यूरोप से भारत को उच्च तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा समाधान, उन्नत विनिर्माण और निवेश प्राप्त हो सकता है, जबकि भारत यूरोप के लिए एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार, कुशल मानव संसाधन और विविध आपूर्ति शृंखला का स्रोत बन सकता है। इस समझौते का एक महत्वपूर्ण आयाम भू-राजनीतिक भी है। अमेरिका द्वारा रूस के साथ अपने संबंधों में पुनर्संतुलन की कोशिश और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर किया है कि उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करना होगा। भारत, जो स्वयं बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है, यूरोप के लिए इस दिशा में एक स्वाभाविक सहयोगी बन सकता है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भी ऐसे साझेदारों की तलाश में है, जो केवल बाज़ार ही नहीं, बल्कि निवेश, तकनीक और रोजगार सृजन में सहायक हों। भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे की परिकल्पना इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। अरब प्रायद्वीप के माध्यम से भारत को यूरोप से जोड़ने वाला यह गलियारा न केवल व्यापारिक मार्गों को छोटा और सुरक्षित बना सकता है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका को भी सुदृढ़ कर सकता है। यद्यपि ग़ज़ा में संघर्ष के कारण इस परियोजना पर फिलहाल विराम लगा है, फिर भी इसकी अवधारणा यह संकेत देती है कि भारत और यूरोप अपने संबंधों को केवल द्विपक्षीय व्यापार तक सीमित नहीं रखना चाहते। भारत द्वारा न्यूज़ीलैंड, चिली, पेरू, ब्रिटेन और ओमान जैसे देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर तेज़ी से आगे बढ़ना भी इसी रणनीतिक पुनर्संतुलन का हिस्सा है। ब्रिटेन के साथ हाल ही में हुए समझौते, जिसमें कारों से लेकर शराब तक कई उत्पादों पर शुल्क समाप्त किए गए, यह दर्शाते हैं कि भारत अब चयनात्मक और रणनीतिक ढंग से अपने बाज़ार खोलने को तैयार है। भारत–ईयू समझौता यदि सफलतापूर्वक संपन्न होता है, तो यह न केवल व्यापार के आंकड़ों में वृद्धि करेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। अंततः भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ आर्थिक लाभ, राजनीतिक विवेक और सामाजिक संवेदनशीलता का संतुलन साधना अनिवार्य है। यह समझौता तभी सफल और टिकाऊ होगा, जब यह दोनों पक्षों के विकासात्मक लक्ष्यों के साथ-साथ उनकी आंतरिक संवेदनशीलताओं का भी सम्मान करे। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल दो क्षेत्रों के बीच व्यापार का विस्तार नहीं करेगा, बल्कि एक ऐसी साझेदारी की नींव रखेगा, जो बदलती वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता, सहयोग और साझा समृद्धि का प्रतीक बन सके। योगेन्द्र सिंह

Readers Comments

Post Your Comment here.
Characters allowed :
Follow Us


Monday - Saturday: 10:00 - 17:00    |    
info@bhavykhabar.com
Copyright© Bhavy Khabar
Powered by DiGital Companion