2026-05-06 18:29:18
नई दिल्ली / भव्य खबर । चुनाव यानी लोकतंत्र का त्यौहार, मगर यह त्यौहार अधिकतर लोगों के लिए पर्व कम और जंजाल ज़्यादा बन जाता है। कारण साफ है — पार्टियों के रोड शो, VVIP रूट लगने से घंटों रास्तों का बंद रहना, सड़कों पर योजनाओं का प्रचार, और चुनाव के बाद का जश्न — यह सब उन आम लोगों के लिए मुश्किल का सबब बन जाता है जिन्हें अपने रोज़मर्रा के काम पर समय से पहुंचना होता है।
जब आगमन से पहले ही थम जाती है ज़िंदगी
ज़रा एक आम दृश्य की कल्पना कीजिए। किसी राज्य में चुनाव के नतीजे आते हैं, और जीत का जश्न मनाने पार्टी के दिग्गज नेता पार्टी ऑफिस पहुंचते हैं, शाम के तय कार्यक्रम के लिए कई घंटे पहले से ही रास्तों को या तो डाइवर्ट कर दिया जाता है या पूरी तरह बंद। नतीजा यह कि 2 मिनट का रास्ता आम लोगों को 10–12 मिनट में तय करना पड़ता है। यह तो तब है जब केवल आगमन की तैयारी हो रही होती है। जैसे ही नेताओं के पहुंचने का समय करीब आता है, पूरा रास्ता आम जनता के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है — तब तक, जब तक सभी पार्टी ऑफिस के भीतर न पहुंच जाएं।
मामला यहीं नहीं रुकता। जब इन नेताओं के वापस लौटने का समय आता है, तब उससे काफी पहले से ही सारे रास्ते दोबारा बंद कर दिए जाते हैं। यानी एक VVIP कार्यक्रम के लिए शहर का बड़ा हिस्सा कई घंटों तक ठहर जाता है।
सुरक्षा ज़रूरी है, मगर आम आदमी के समय का क्या?
सुरक्षा का सवाल अहम है, इसमें कोई दो राय नहीं। मगर सवाल यह भी है कि क्या आम जनता के समय का कोई मूल्य नहीं? क्या उन लोगों का कोई महत्व नहीं जिन्होंने ही इन प्रतिनिधियों को वोट देकर चुना है?
यह समस्या किसी एक पार्टी विशेष की नहीं है। हर राज्य, हर केंद्र शासित प्रदेश में VVIP मूवमेंट के लिए यही व्यवस्था की जाती है। नतीजतन कई बच्चे और बुज़ुर्ग धूप में झुलसते रहते हैं, कोई युवा अपने ऑफिस में आधे दिन की तनख्वाह कटवाने को मजबूर होता है — बस इसलिए, ताकि हमारे ही चुने हुए प्रतिनिधि समय पर अपनी जगह पहुंच सकें।
एक छोटी-सी कहानी, बड़ा सबक
रूट लगने की बात पर एक मार्मिक दृश्य ज़हन में उभरता है। दो बुज़ुर्ग दंपति रेलवे स्टेशन भागते हुए पहुंचते हैं, मगर 1 मिनट देर हो जाने के कारण उनकी ट्रेन छूट जाती है। दोनों परेशान हैं, एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे हैं। आस-पास के लोग सलाह देते हैं — आप तो बुज़ुर्ग हैं, इतनी भागदौड़ नहीं कर सकते, थोड़ा जल्दी निकला कीजिए।
तभी पति को पानी पकड़ाते हुए बिलबिलाती आवाज़ में पत्नी जवाब देती है — हम तो ट्रेन से एक घंटे पहले पहुंचने के हिसाब से ही निकले थे। लाल बत्ती पर 45 मिनट ट्रैफिक रोक रखा था, इसी कारण देर हो गई।
यह सुनकर मन में एक ही सवाल कौंधता है — क्या इस परेशानी का कोई मूल्य नहीं?
इमरजेंसी गाड़ियों की हकीकत
VVIP रूट में अगर किसी एम्बुलेंस, अग्निशमन वाहन या ऐसे किसी वाहन को आपात स्थिति में निकलना हो, तो वो चाहकर भी निकल नहीं पाती। इतनी भीड़ और चारों तरफ से बंद रास्तों के बीच में फंसी एम्बुलेंस के लिए कोई रास्ता बना पाना लगभग असंभव होता है। कितने ही लोग इस व्यवस्था की कीमत अपनी जान देकर चुकाते हैं — आंकड़ों में नहीं आते, मगर परिवार की यादों में हमेशा रहते हैं।
क्या होना चाहिए — एक व्यावहारिक सुझाव
हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों का आम जनता से मिलना ज़रूरी है। मगर यह काम समय का ध्यान रखकर होना चाहिए, ताकि परेशानियां सुलझाने आए नेता खुद किसी की परेशानी का सबब न बन जाएं। जश्न मनाना अधिकार है, मगर किसी को असुविधा में डालकर नहीं। रोड शो और जनसभाएं ज़रूरी हैं, मगर वह समय और जगह चुनी जानी चाहिए जब जनता को कैंपेनिंग से कम से कम तकलीफ हो।
कुछ ठोस सुझाव हो सकते हैं — जनसभाएं और रोड शो सुबह जल्दी या देर शाम आयोजित किए जाएं, जब रास्तों पर ट्रैफिक का दबाव कम होता है। पार्टी ऑफिस शहर के बीचोंबीच नहीं, बल्कि शहर के बाहरी इलाकों में स्थापित किए जाएं, ताकि हर मीटिंग, सेलिब्रेशन, और प्रेस कॉन्फ्रेंस बिना आम जनता को परेशान किए हो सके। VVIP ट्रैवल शेड्यूल ऐसे समय पर बनाए जाएं जब प्रशासन और जनता दोनों को सुविधा हो। रास्ते पूरी तरह बंद करने के बजाय वैकल्पिक रूट पहले से तैयार किए जाएं, और एम्बुलेंस-दमकल जैसी आपातकालीन सेवाओं के लिए स्पष्ट कॉरिडोर सुनिश्चित किया जाए।
समय भी एक निवेश है
देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनके पास समय के अलावा कोई और निवेश नहीं है। दिहाड़ी मज़दूर, छोटे दुकानदार, टैक्सी ड्राइवर, स्कूल जाते बच्चे, अस्पताल पहुंचते मरीज़ — इन सबके लिए हर घंटा कीमती है। मगर अफसोस, VVIP गाड़ियों के काफिले के सामने इनके समय की कीमत हमेशा कम आंकी जाती है।
चुनाव आयोग और न्यायपालिका से अपेक्षा
चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि लोकतंत्र के इस महापर्व के दौरान सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ-साथ आम लोगों की सुविधा का भी पूरा ख्याल रखा जाए — ताकि नेता और जनता दोनों इस त्यौहार को एक साथ खुशी और उल्लास से मना सकें।
हमारे जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ न्यायपालिका को भी इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि यह VVIP कल्चर आम लोगों के लिए कितनी बड़ी परेशानी का कारण बन चुका है। इसमें बदलाव की सख्त ज़रूरत है, और यह बदलाव सिर्फ कागज़ी दिशा-निर्देशों से नहीं, बल्कि ज़मीनी एक्शन से ही संभव है।
विचार
लोकतंत्र का असली अर्थ तभी पूरा होता है जब उसका त्यौहार हर नागरिक के लिए उत्सव हो — किसी के लिए जश्न और किसी के लिए जंजाल नहीं। नेता हमारे चुने हुए हैं, वे हमारे लिए हैं — हम उनके लिए नहीं। जिस दिन यह सोच हमारे शासन तंत्र में गहराई से बैठ जाएगी, उस दिन चुनाव वाकई लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत त्यौहार बन जाएगा।