2026-04-18 12:49:28
नई दिल्लीभव्य खबर । विपक्ष ने कहा—महिला अधिकारों के नाम पर संवैधानिक ढांचे को बदलने की कोशिश, सरकार पर गंभीर आरोप
संसद में महिला आरक्षण और उससे जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा टकराव देखने को मिला। विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस नेतृत्व ने इसे महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा बताते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिला आरक्षण की आड़ में देश के राजनीतिक और चुनावी ढांचे को बदलने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वास्तव में महिलाओं के हित की चिंता है, तो पहले से पारित महिला आरक्षण विधेयक को तुरंत लागू किया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि संसद को तत्काल बुलाकर इस पर निर्णय लिया जाए ताकि स्पष्ट हो सके कि कौन वास्तव में महिलाओं के पक्ष में है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस पूरे घटनाक्रम को मोदी सरकार की “असंवैधानिक चाल” की हार बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने देश की आधी आबादी—महिलाओं—को ढाल बनाकर परिसीमन लागू करने की कोशिश की, जो लोकतंत्र, संविधान और संघीय ढांचे पर सीधा हमला था। खरगे ने विपक्ष की एकजुटता की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रयास को समय रहते पहचान लिया गया और विधेयक गिर गया।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस विधेयक पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह वास्तविक महिला सशक्तिकरण का प्रयास नहीं था, बल्कि भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की योजना थी। उनके अनुसार, यह प्रस्ताव ओबीसी, एससी-एसटी, दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और छोटे राज्यों के हितों के खिलाफ था। उन्होंने इसे “राष्ट्र-विरोधी” करार देते हुए कहा कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर इसे सफल नहीं होने देगी।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि महिला आरक्षण से संबंधित कानून 2023 में पहले ही पारित हो चुका है और उसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह जानती है कि नया विधेयक पारित नहीं हो सकता, फिर भी इसे राजनीतिक लाभ के लिए लाया गया। उनके अनुसार, इसके पीछे दो उद्देश्य थे—चुनावी संरचना में बदलाव और प्रधानमंत्री की छवि को महिला समर्थक दिखाना।
प्रियंका गांधी ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि महिला आरक्षण को 2011 की जनगणना और परिसीमन से जोड़ना एक सोची-समझी रणनीति थी, जिसमें ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ऐसी किसी भी व्यवस्था से सहमत नहीं हो सकती जो सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो।
उन्होंने भाजपा पर महिलाओं से जुड़े मामलों में निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए हाथरस, उन्नाव, मणिपुर और महिला पहलवानों के मुद्दों का उल्लेख किया और कहा कि अब वही लोग महिला हितैषी होने का दावा कर रहे हैं।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी इस विधेयक को “कुटिल और चालाकी भरा प्रयास” बताया। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण को परिसीमन जैसे “खतरनाक प्रस्तावों” से जोड़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा था, जिसे विपक्ष ने विफल कर दिया। उन्होंने सरकार से मांग की कि 2023 में पारित “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” को 2029 के चुनावों से लागू किया जाए।
पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए राहुल गांधी ने संसद परिसर में कहा कि यह संविधान पर हमला था, जिसे विपक्ष ने रोक दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर भी इस विधेयक के गिरने को लोकतंत्र की जीत बताया और कहा कि देश ने देख लिया कि विपक्ष एकजुट होकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कर सकता है।
इस राजनीतिक टकराव के बीच राहुल गांधी ने अपने भाषण में “नंबर 16” की एक पहेली भी दी, जिसे लेकर उन्होंने संकेत दिया कि आने वाले समय में इसका खुलासा होगा।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण के मुद्दे ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में गहरे वैचारिक और संरचनात्मक मतभेदों को उजागर कर दिया है। जहां सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक ढांचे में बदलाव की कोशिश मान रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है।