महिला आरक्षण बिल पर सियासी संग्राम संसद से सड़क तक गूंजा विरोध

परिसीमन से जुड़े विवाद के बीच विपक्ष का केंद्र पर हमला, सरकार की मंशा पर उठे गंभीर सवाल
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2026-04-19 18:32:44

नई दिल्लीभव्य खबर । रविवार को देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल देखने को मिली, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध उस समय हुआ जब लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पारित नहीं किया जा सका।

इस प्रदर्शन में कांग्रेस नेता अलका लांबा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को जानबूझकर परिसीमन (delimitation) की प्रक्रिया से जोड़कर जटिल बना दिया है।

कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता रागिनी नायक ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए सवाल उठाया कि आखिर महिला आरक्षण बिल, जिसे 2023 में पास किया गया था, अब तक लागू क्यों नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि “महिला आरक्षण को 2034 तक टालना और उसे परिसीमन से जोड़ना देश की एकता और अखंडता के साथ खिलवाड़ है।” उन्होंने प्रधानमंत्री के संबोधन को “भ्रामक” और “राजनीतिक साजिश” करार दिया।

वहीं कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा महिलाओं को गुमराह कर रही है। उनके मुताबिक, “महिला आरक्षण के नाम पर असल मकसद परिसीमन लागू करना है, जो पूरी तरह से गलत है।”

कांग्रेस सांसद जेबी मैथर ने भी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि 2014 से अब तक महिलाओं को सिर्फ वादों से बहलाया गया है। उन्होंने कहा कि “सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण का केवल दिखावा कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।”

दरअसल, 16 से 18 अप्रैल तक चले विशेष सत्र में महिला आरक्षण से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा हुई थी। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित कई नेताओं ने अपनी बात रखी।

विपक्षी दलों के नेताओं जैसे अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी और केसी वेणुगोपाल ने भी इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा की।

हालांकि, मतदान के दौरान यह विधेयक पारित नहीं हो सका। कुल 298 सांसदों ने इसके पक्ष में और 230 ने इसके विरोध में मतदान किया। विपक्ष ने परिसीमन प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों का विरोध करते हुए बिल का समर्थन नहीं किया।

सरकार का प्रस्ताव था कि लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 किया जाए और इनमें 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों। यह परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाना था।

विधेयक के गिरने के बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य दो बिलों को भी आगे न बढ़ाने का फैसला किया।

अब यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है, जहां एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों के साथ राजनीति करार दे रहा है।

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