पेट की आग के सामने फीकी पड़ी धर्म, जाति कि पहचान

नोएडा की सड़कों पर पिछले दिनों जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था धर्म, जाति और पहचान के नाम पर जो दीवारें समाज में खड़ी की गई थीं, वे भूख और आजीविका के सवाल के सामने अचानक बहुत छोटी और कमजोर लगने लगती हैं।
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2026-04-18 17:51:49

नोएडा की सड़कों पर पिछले दिनों जो दृश्य सामने आया, वह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था; वह उस सच्चाई का आईना था जिसमें नागरिक अधिकार और सत्ता की कठोरता आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं। विडंबना यह है कि जिस समाज ने कभी “सबक सिखाने” वाली राजनीति और सख़्त प्रशासनिक कार्रवाई के नारों पर ताली बजाई थी, वही समाज आज उसी तंत्र के सामने खुद को असहाय और असुरक्षित महसूस कर रहा है। जब सत्ता की कठोरता का पहिया घूमता है तो वह यह नहीं देखता कि उसके नीचे कौन है; वह केवल चलता है, और उसके नीचे इंसान की पीड़ा, अधिकार और उम्मीदें कुचलती चली जाती हैं।

धर्म, जाति और पहचान के नाम पर जो दीवारें समाज में खड़ी की गई थीं, वे भूख और आजीविका के सवाल के सामने अचानक बहुत छोटी और कमजोर लगने लगती हैं। जब किसी घर का चूल्हा ठंडा हो, जब भविष्य अनिश्चित हो और जब मेहनत करने वाला इंसान अपने श्रम का सम्मान माँग रहा हो, तब यह मायने नहीं रखता कि गिरफ्तार होने वाला अब्दुल है या किशन। उस क्षण वह केवल एक श्रमिक होता है, एक नागरिक होता है, जिसकी सबसे बड़ी माँग बस इतनी होती है कि उसे इंसान की तरह सुना जाए और न्याय की तरह समझा जाए। लेकिन अक्सर यही आवाज़ सबसे पहले दबा दी जाती है। दुर्भाग्य यह भी है कि हमारे समाज में किसी भी जनआंदोलन को बदनाम करने की एक पुरानी और सुविधाजनक परंपरा बन चुकी है। जायज़ सवालों को पहले “साज़िश” कहा जाता है, फिर “बाहरी तत्वों” का आरोप लगाया जाता है, और अंत में कुछ उपद्रवी घटनाओं को आधार बनाकर पूरी भीड़ को दोषी घोषित कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में असली मुद्दा धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है और सामने रह जाती है केवल वह तस्वीर जिसमें राज्य की शक्ति को उचित ठहराने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के उस मूल विचार को ही कमजोर करती है जिसमें असहमति को भी एक वैध आवाज़ माना गया है।

जब शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बुनियादी जरूरतों की मांग कर रहे लोगों पर लाठियाँ बरसती हैं, तो सवाल केवल उस भीड़ का नहीं रह जाता; सवाल लोकतंत्र के उस वादे का बन जाता है जो हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार देता है। कानून का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन जब वही कानून संवेदनहीनता का औजार बन जाए तो न्याय की आत्मा घायल होने लगती है। विशेष रूप से तब, जब नाबालिगों को वयस्कों के साथ जेलों में डाल दिया जाए और प्रक्रिया की मर्यादाएँ भी टूटती हुई दिखाई दें। यह केवल कानूनी त्रुटि नहीं, बल्कि समाज की मानवीय संवेदना के क्षरण का संकेत भी है।

सबसे पीड़ादायक दृश्य उन परिवारों का है जो अपने अपनों की तलाश में भटक रहे हैं—कभी थाने, कभी अदालत, कभी जेल के बाहर। उनके लिए यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है; उनके लिए यह उनके बेटे, भाई, पति या पिता का सवाल है। जिस व्यवस्था से उन्हें सुरक्षा और भरोसा मिलना चाहिए, उसी व्यवस्था के गलियारों में वे उत्तर तलाशते फिर रहे हैं। यह स्थिति हमें भीतर तक झकझोरती है और याद दिलाती है कि व्यवस्था का असली मूल्यांकन उसके सबसे कमजोर नागरिक के अनुभव से ही होता है।

यह पूरी घटना हमें एक गहरी सीख भी देती है। जब हम किसी और के लिए न्याय की जगह बदले की भाषा का समर्थन करते हैं, जब हम सत्ता की कठोरता को केवल इसलिए सही मान लेते हैं क्योंकि उसका निशाना कोई दूसरा है, तब हम अनजाने में उसी बेलगाम तंत्र को मजबूत कर रहे होते हैं जो एक दिन हमारे दरवाज़े पर भी दस्तक दे सकता है। सत्ता की लाठी किसी की स्थायी साथी नहीं होती; वह केवल शक्ति का प्रतीक होती है, और जब वह चलती है तो उसके सामने हर व्यक्ति सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाता है।

इसीलिए समाज के रूप में हमें यह तय करना होगा कि हम कैसा लोकतंत्र चाहते हैं—डर और दमन से चलने वाला या संवाद और संवेदना से मजबूत होने वाला। अधिकारों की रक्षा केवल कानून की किताबों से नहीं होती, बल्कि उस सामाजिक चेतना से होती है जो हर अन्याय पर आवाज़ उठाने का साहस रखती है। यदि हम सच में एक न्यायपूर्ण समाज बनाना चाहते हैं तो हमें यह याद रखना होगा कि किसी भी नागरिक की पीड़ा केवल उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं होती; वह पूरे लोकतंत्र की परीक्षा होती है। और इस परीक्षा में सफल वही समाज होता है जो सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस भी रखता है और इंसानियत को सबसे ऊपर रखने का विवेक भी।

लेखक : रश्मि दीक्षित

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