कोविड 19 जख्मों पर मरहम है सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब कोई टीकाकरण कार्यक्रम राज्य द्वारा संचालित सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल के रूप में चलाया जाता है, तो सरकार उन परिवारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती जो टीकाकरण के बाद मौत या गंभीर दुष्प्रभावों का आरोप लगाते हैं।
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2026-04-19 13:34:26

ईजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग के बीच अहम खबर दबकर रह गई। ये खबर जुड़ी है सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले से जो कोविड-19 को लेकर दिया गया है। कुछ दिनों पहले ही याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाले गंभीर दुष्प्रभावों के मामलों में “दोष तय किए बिना मुआवजा देने की नीति” तैयार की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब कोई टीकाकरण कार्यक्रम राज्य द्वारा संचालित सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल के रूप में चलाया जाता है, तो सरकार उन परिवारों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती जो टीकाकरण के बाद मौत या गंभीर दुष्प्रभावों का आरोप लगाते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारी आंकड़े स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि कोविड-19 टीकाकरण के बाद कुछ मौतें हुई हैं, इसलिए प्रभावित परिवारों को बिना किसी राहत व्यवस्था के नहीं छोड़ा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) को केवल गलती या लापरवाही के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह कोविड-19 टीकाकरण के बाद होने वाले गंभीर प्रतिकूल प्रभावों के लिए “नो-फॉल्ट मुआवजा नीति” तैयार करे। यह आदेश रचना गांगू बनाम भारत संघ समेत कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिन्हें उन परिवारों ने दायर किया था जिन्होंने टीकाकरण के बाद मौत या गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का आरोप लगाया था। अदालत ने कहा कि महामारी के दौरान चलाया गया टीकाकरण कार्यक्रम राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा था और इससे कई लोगों की जान बची। लेकिन यदि सरकारी डेटा यह दिखाता है कि कुछ लोगों की मौत या गंभीर दुष्प्रभाव हुए हैं, तो राज्य इससे पूरी तरह अलग नहीं हो सकता। कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय शोधों का हवाला देते हुए कहा था कि एस्ट्राजेनेका प्लेटफॉर्म (जिसका भारतीय संस्करण कोविशील्ड है) से दुर्लभ रक्त के थक्के बनने जैसी समस्याओं के मामले सामने आए हैं और इन जोखिमों के बारे में पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बड़े पैमाने पर चलने वाले टीकाकरण कार्यक्रमों में वैज्ञानिक रूप से यह साबित करना कि नुकसान किस कारण हुआ, अक्सर जटिल होता है। ऐसे में केवल लापरवाही साबित करने पर आधारित कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं होते, क्योंकि इससे प्रभावित परिवारों पर भारी बोझ पड़ता है और परिणाम असंगत हो सकते हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि यूके, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे कई देशों में वैक्सीन से जुड़े दुष्प्रभावों के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा योजना मौजूद है, जिससे बिना लंबी कानूनी प्रक्रिया के प्रभावित लोगों को आर्थिक सहायता मिल जाती है। मालूम हो कि केंद्र सरकार ने सन 2022 में कोर्ट में दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे में कहा था कि टीकाकरण स्वैच्छिक था और लोगों ने जोखिमों की जानकारी के आधार पर स्वयं निर्णय लेकर टीका लगवाया था, इसलिए सरकार मुआवजा देने के लिए बाध्य नहीं है। सरकार के अनुसार लोगों ने संभावित जोखिमों की जानकारी के आधार पर स्वयं निर्णय लेकर टीका लगवाया था। पाठकों को याद होगा जब भी कोविड वैक्सीन के विपरीत प्रभाव के कारण मौतों की खबर सामने आ रही थी तब सरकार की ओर से कभी जिम तो कभी डांस को मौत का कारण बता दिया जाता था। या फिर कभी किसी मृतक की पुरानी बीमारी जैसे हार्ट डिसीस, या टीबी या ऐसी ही किसी बीमारी की वजह से मौत होना बता दिया जाता था।

पाठकों को बता दें कि एम्स दिल्ली के पैथोलॉजी और फोरेंसिक मेडिसिन विभाग ने मई 2023 से अप्रैल 2024 तक स्टडी की थी। यह स्टडी इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित भी हुई है। इसमें हत्या, आत्महत्या और नशे की वजह से मौतों को छोड़कर अचानक होने वाली मौतों पर रिसर्च किया गया। 19-45 साल और 46-65 साल के लोगों की मौतों के डेढ़ सौ से ज्यादा मामलों की जांच हुई। अध्ययन में पाया गया कि युवाओं में दो तिहाई मौतों की वजह दिल की बीमारियां थी। इन मौतों में अधिकांश मामलों में एथेरोस्क्लेरोटिक कोरोनरी आर्टरी डिजीज पाई गई, मतलब दिल की नसों में 70 प्रतिशत से अधिक ब्लॉकेज। इसके अलावा युवाओं की मौत के एक तिहाई मामलों में सांस से जुड़ी बीमारियां जैसे न्यूमोनिया, टीबी को पाया गया। बीस फीसदी मामलों में मौतों की कोई स्पष्ट वजह नहीं मिल सकी। एम्स की स्टडी में बताया गया है कि इन मौतों के मामलों में औसत उम्र सिर्फ 30.5 साल थी। इसमें सबसे ज्यादा मामले 30-40 साल की उम्र के 50 प्रतिशत और 20-30 साल की उम्र के 40 प्रतिशत लोगों के थे। आधे मामलों में जब दिल की टिश्यू की बारीक जाँच (हिस्टोपैथोलॉजी) की गई, तो उसमें दिल में कुछ हल्के-मामूली बदलाव दिखे जैसे दिल की मांसपेशियाँ थोड़ी मोटी हो जाना, धमनियों में चर्बी की पतली परत जमना या दिल के छोटे-छोटे हिस्सों में खून की हल्की कमी के निशान का मिलना। स्टडी में कहा गया कि ये बदलाव इतने गंभीर नहीं थे कि मौत का सीधा कारण बन सकें। एम्स स्टडी में युवाओं की अचानक मौतों का सबसे बड़ा कारण दिल से जुड़ी बीमारियां बताई गई हैं। इसके अलावा सांस की समस्याएँ और हार्ट अटैक आदि की मुख्य वजह बताई गई है। हालांकि, एम्स दिल्ली की स्टडी और रिपोर्ट पर दिगर विशेषज्ञ चिकित्सक भी सवालिया निशान लगा चुके हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट में पुणे डॉक्टर अमिताभ बनर्जी ने कहा था कि स्टडी में करीब बीस प्रतिशत मामलों में मौत का कारण पता नहीं चला, क्या इन अज्ञात मामलों में कोविड वैक्सीन का कोई रोल तो नहीं? डॉक्टर अमिताभ बनर्जी भारत में इस्तेमाल हुई कोविशील्ड वैक्सीन के संदर्भ में कहते हैं यूरोप के कई देशों ने कोविशील्ड वैक्सीन को दुर्लभ लेकिन गंभीर साइड इफेक्ट्स जैसे ब्लड क्लॉट्स की वजह से अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया था। उन्होंने एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन के उत्पादन बंद होने पर भी सवाल उठाया था। कोरोना का टीका बनाने वाली फार्मास्युटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका ने ये माना था कि उसके वैक्सीन के गंभीर साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। कंपनी ने ब्रिटेन के हाई कोर्ट में इस बात को माना था कि वैक्सीन के कारण किसी को थ्रोम्बोसिस विद थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम जैसी स्थिति हो सकती है। एस्ट्राजेनेका ने ही भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के साथ मिलकर कोविशील्ड को तैयार किया था। खैर ये माना जा सकता है कि ये साइड इफेक्ट्स रेयरेस्ट ऑफ द रेयर है लेकिन जब करोड़ों लोगों पर इसका उपयोग हो तो प्रभावितों की संख्या में अधिक हो सकती है। एम्स की रिपोर्ट भले ही ये कहती हो कि वैक्सीन का अचानक हुई मौतों खासकर युवाओं की मौतों, से कोई संबंध नहीं है लेकिन एम्स को अपनी स्टडी में यह भी बताना था कि फिर आखिर वे कौन से कारण हैं जिनसे युवाओं की अचानक मौतें हुई। अचानक होने वाली मौतों का सिलसिला तो अभी भी जारी है। बहरहाल, कोरोना का असर वैश्विक था। लेकिन, जितनी मौतें भारत में हुईं शायद ही किसी और देश में इतनी मौतें हुईं हों खासकर युवाओं की। जो भी हो, शीर्ष अदालत के इस फैसले से उन पीड़ितों को जरूर राहत मिलेगी जो वैक्सीन के विपरीत असर की वजह से पीड़ित हैं। सुप्रीम कोर्ट का ये निर्णय मृतकों के परिजनों और पीड़ितों के जख्म पर मरहम का काम जरूर करेगा।

लेखक : मुस्ताअली बोहरा

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