2026-01-31 12:44:25
बजट किसी भी देश का सिर्फ आय - व्यय का दस्तावेज़ नहीं होता, बल्कि वह सरकार की सामाजिक प्राथमिकताओं, आर्थिक दृष्टि और नागरिकों के प्रति उसके दायित्वों का आईना होता है। भारत जैसे देश में, जहां जनसंख्या का बड़ा हिस्सा या तो सीमित आय में जीवन यापन करता है या रिटायरमेंट के बाद पेंशन और बचत पर निर्भर होता है, वहां बजट की सामाजिक भूमिका और भी गहरी हो जाती है। बजट 2026 से पहले सबसे ज्यादा चर्चा सीनियर सिटीज़न्स और मिडिल क्लास को लेकर हो रही है, क्योंकि यही दो वर्ग हैं जो बढ़ती महंगाई, इलाज के खर्च और टैक्स सिस्टम के दबाव को सबसे ज्यादा महसूस कर रहे हैं।
भारत तेजी से बुजुर्ग आबादी वाला देश बनता जा रहा है। औसत आयु बढ़ रही है, लेकिन उसी अनुपात में सामाजिक सुरक्षा और आय के स्थायी साधन नहीं बढ़े हैं। एक बड़ी संख्या ऐसे सीनियर सिटीज़न्स की है, जिनके पास नियमित पेंशन नहीं है या जो बहुत सीमित पेंशन पर जीवन यापन कर रहे हैं। महंगाई के इस दौर में, जब दवाइयों, जांचों और अस्पताल के खर्च में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक जीवन एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। यही कारण है कि बजट 2026 से पहले पेंशन और हेल्थकेयर को लेकर उम्मीदें असाधारण रूप से ऊंची हैं।
पेंशन का सवाल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक गरिमा से भी जुड़ा है। 70 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए अलग पेंशन स्लैब की चर्चा इसीलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस आयु वर्ग में आमदनी के स्रोत लगभग खत्म हो जाते हैं, जबकि खर्च लगातार बढ़ते रहते हैं। EPS-95 पेंशनर्स की लंबे समय से चली आ रही मांग, जिसमें न्यूनतम Rs 7,500 मासिक पेंशन और उस पर महंगाई भत्ता शामिल करने की बात कही जाती है, सिर्फ एक मांग नहीं बल्कि सिस्टम की कमियों की ओर इशारा है। यदि पेंशन की राशि वास्तविक जीवन की जरूरतों से मेल नहीं खाती, तो उसका सामाजिक उद्देश्य ही कमजोर हो जाता है। इसके साथ ही सोशल-वेलफेयर पेंशन योजनाओं की पात्रता, प्रक्रिया और राशि पर भी पुनर्विचार जरूरी है। आज भी कई बुजुर्ग सिर्फ इसलिए योजनाओं से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनके पास सही दस्तावेज़ नहीं होते या प्रक्रिया अत्यधिक जटिल होती है। विधवा, दिव्यांग और अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए उच्च पेंशन स्लैब का विचार सामाजिक न्याय की दिशा में एक जरूरी कदम हो सकता है। बजट 2026 अगर इस दिशा में ठोस सुधार करता है, तो यह सिर्फ आर्थिक राहत नहीं बल्कि मानवीय संवेदनशीलता का संकेत होगा। टैक्स के मोर्चे पर सीनियर सिटीज़न्स को पहले से कुछ राहत जरूर मिली हुई है, लेकिन वह भी समय के साथ अपर्याप्त होती जा रही है। बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है, लेकिन हेल्थ से जुड़े डिडक्शन आज के हालात में बहुत छोटे लगने लगे हैं। रू 50,000 की हेल्थ इंश्योरेंस डिडक्शन तब तय की गई थी, जब इलाज का खर्च आज की तुलना में काफी कम था। आज एक सामान्य अस्पताल में एक बड़ी बीमारी का इलाज लाखों में पहुंच चुका है। ऐसे में हेल्थ डिडक्शन को बढ़ाना सिर्फ टैक्स राहत नहीं, बल्कि आर्थिक संकट से बचाव का साधन भी बन सकता है।
हेल्थकेयर बजट का दूसरा अहम पहलू है प्रिवेंटिव केयर। बुजुर्गों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि वे बीमार पड़ते हैं, बल्कि यह है कि बीमारियों की पहचान देर से होती है। डायबिटीज, बीपी, हृदय रोग और डिमेंशिया जैसी बीमारियों में समय पर जांच से खर्च और तकलीफ दोनों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बजट 2026 में अगर जेरियाट्रिक ओपीडी, नियमित स्क्रीनिंग और छोटे शहरों तक सरकारी हेल्थ योजनाओं के विस्तार पर फोकस होता है, तो इसका असर दूरगामी होगा।
जहां एक ओर सीनियर सिटीज़न्स की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर मिडिल क्लास का टैक्स दबाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है। नई टैक्स व्यवस्था को सरल और कम टैक्स बोझ वाला बताया गया, और आंकड़े भी दिखाते हैं कि बड़ी संख्या में टैक्सपेयर्स ने इसे चुना है। लेकिन यह भी सच है कि इस व्यवस्था में डिडक्शन का लगभग पूरी तरह खत्म हो जाना उन लोगों के लिए नुकसानदेह है, जिन्होंने लंबी अवधि की प्लानिंग के तहत निवेश, बीमा और होम लोन लिया है। पुरानी टैक्स व्यवस्था में मौजूद डिडक्शन सीमाएं आज की महंगाई के सामने बेहद कमजोर दिखती हैं। सेक्शन 80C की सीमा 2014 से जस की तस है, जबकि इस दौरान शिक्षा, घर और बीमा की लागत कई गुना बढ़ चुकी है। रू 1.5 लाख की सीमा में पीपीएफ, ईएलएसएस, बच्चों की फीस और होम लोन प्रिंसिपल जैसे खर्च समाहित करना अब व्यावहारिक नहीं रह गया है। इसे बढ़ाकर 3 लाख या उससे अधिक करने की मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि मिडिल क्लास की सेविंग कैपेसिटी पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। सेक्शन 80D और होम लोन ब्याज डिडक्शन की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। आज के समय में रू 2 लाख का ब्याज डिडक्शन बड़े शहरों में एक औसत होम लोन की ईएमआई के सामने बहुत छोटा पड़ता है। प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतों और ऊंची ब्याज दरों के बीच यह सीमा वास्तविकता से कट चुकी है। अगर सरकार अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे टैक्स डिडक्शन के जरिए मिडिल क्लास को राहत देनी ही होगी।
रिटायरमेंट प्लानिंग के संदर्भ में NPS का महत्व लगातार बढ़ा है, लेकिन 80CCD(1B) के तहत रू 50,000 की अतिरिक्त डिडक्शन सीमा आज की जरूरतों के मुकाबले काफी कम है। जीवन प्रत्याशा बढ़ने के साथ रिटायरमेंट के बाद के वर्षों का खर्च भी बढ़ गया है। ऐसे में रिटायरमेंट सेविंग को मजबूत करने के लिए इस सीमा में बढ़ोतरी एक तार्किक कदम होगा।
असल चुनौती यह है कि टैक्स सिस्टम और महंगाई के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। टैक्स नियम स्थिर हैं, जबकि जीवन के खर्च तेजी से बदल रहे हैं। इसका असर यह होता है कि टैक्सपेयर्स कागज़ों पर तो राहत महसूस करते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनका वित्तीय तनाव कम नहीं होता। बजट 2026 अगर इस गैप को पाटने की कोशिश करता है, तो वह मिडिल क्लास और सीनियर सिटीज़न्स दोनों के लिए भरोसे का संदेश होगा।
बजट से पहले उम्मीदें और सुझाव हमेशा ज्यादा होते हैं। हर मांग पूरी हो, यह संभव नहीं। लेकिन अगर सरकार कुछ सीमित लेकिन ठोस कदम उठाती है जैसे पेंशन में तार्किक बढ़ोतरी, हेल्थ डिडक्शन में सुधार और कुछ डिडक्शन को नई टैक्स व्यवस्था में शामिल करना। तो इसका प्रभाव व्यापक होगा। बजट 2026 से देश का एक बड़ा वर्ग यह नहीं चाहता कि उसे असाधारण रियायतें मिलें, बल्कि यह चाहता है कि नीतियां वास्तविक जीवन की चुनौतियों को समझें। सीनियर सिटीज़न्स सम्मान और सुरक्षा चाहते हैं, जबकि मिडिल क्लास स्थिरता और भविष्य की चिंता से कुछ राहत चाहता है। अगर बजट इन दोनों अपेक्षाओं के बीच संतुलन बना पाता है, तो यह सिर्फ आर्थिक दस्तावेज़ नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक भरोसे का आधार भी बनेगा। असली परीक्षा 1 फरवरी को होगी, जब शब्दों को आंकड़ों और घोषणाओं में बदला जाएगा। तब तक बजट 2026 उम्मीदों का एक ऐसा आईना है, जिसमें समाज अपनी जरूरतें साफ़-साफ़ देख रहा है।
योगेन्द्र सिंह