2026-01-29 17:26:28
लोकतंत्र की प्रथम कसौटी ही यह होती है कि उसके समस्त नागरिकों में समानता का भाव हो। कोई अपने को छोटा या बड़ा न समझे। धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्र या धन-दौलत के आधार पर किसी तरह का भेदभाव न हो। न लोगों में ऐसा भाव हो और न ही शासन-सत्ता की और से ऐसा व्यवहार किया जाये। इसीलिए हमारे संविधान निमार्ताओं ने देश के लिए ऐसे संविधान की रचना की है, जिसमें समता का यह भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। भारत की आत्मा को समझते हुए उन्होंने विधान बनाया। वे भविष्यदर्शी भी कम नहीं थे। इसलिए जो काम उस समय नहीं कर पाए, उन्होंने भविष्य के लिए दिशा-निर्देश दे दिए। राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत इसी भविष्य दृष्टि के द्योतक हैं। संविधान के अनुच्छेद 44 में दिये गए निर्देशक सिद्धांतों में कहा गया है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। दरअसल अंग्रेजों के जमाने में भारत में अनेक तरह के पारिवारिक कानून प्रचलित थे। हिंदुओं के बीच भी कानूनों को विविधता थी। हर धर्म के लोग अपने-अपने कानून के हिसाब से चलते थे। जिससे अनेक प्रकार की विसंगतियां खड़ी हो जाती थीं। अंग्रेजों ने भी भारत में समान आपराधिक कानून तो स्थापित किया लेकिन पारिवारिक कानूनों को उनकी संवेदनशील प्रकृति के कारण मानकीकृत करने से परहेज किया। जाहिर है, आजादी के समय तक देश इसके लिए पूरी तरह से तैयार नहीं था। इसलिए संविधान सभा ने समान नागरिक संहिता को भविष्य के लिए छोड़ दिया। उन्हें लगता था कि भविष्य में जब देश तरक्की कर लेगा और समाज के सभी वर्ग इतने जागरूक हो जाएंगे, तब वे इस पर आपत्ति नहीं करेंगे। लेकिन आजादी के बाद सांप्रदायिक तुष्टीकरण का ऐसा आसान फामूर्ला सत्ताधीशों के हाथ लगा कि हालात सुधरने की बजाय बदतर होने लगे। आज देश की युवा पीढ़ी समानता चाहती है। राजनेता भी चाहते हैं पर हिम्मत कोई नहीं करता। पर क्या इस तरह हम अपनी भावी पीढ़ियों को और भी कूपमंडूक नहीं बना देंगे? हमारे माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी की छत्रछाया में हमने 2022 के आरंभ में चुनाव प्रचार के दौरान यह घोषणा की कि यदि हम सत्ता में आए तो समान नागरिक संहिता लागू करेंगे। जनता ने हमें इसके लिए समर्थन दिया और सत्ता में आते ही हमने इसकी तैयारी शुरू कर दी। लगभग तीन साल बाद हम इसे लागू करने में सफल हो गए। मार्च, 2022 में जब हमने इसकी प्रक्रिया शुरू की थी, तब लोग हम पर तरह-तरह के आरोप लगाते थे। वे कहते थे कि यह राज्य का विषय है ही नहीं। जबरदस्ती का विवाद खड़ा करके ये वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहते हैं। लेकिन हम डटे रहे। संविधानविदों ने बताया कि ये समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्य भी इस पर कानून बना सकते हैं। हमारे केंद्रीय नेतृत्व का हमें भरपूर समर्थन मिला। एक दिन ऐसा आया कि हम कामयाब हुए। हम न करते तो कौन करता? किसी न किसी को तो शुरूआत करनी ही थी। हमें खुशी है कि देश के अन्य प्रान्तों में भी इसे लाने की अब सुगबुगाहट हो रही है। आज जो लोग हमारी आलोचना कर रहे हैं, 20 वर्ष बाद, या 50 वर्ष बाद जब अन्य राज्यों और केंद्रीय स्तर पर यह कानून लागू हो जाएगा, तब उन्हें पता चलेगा कि इसका क्या महत्व है। मुझे ज्ञात हुआ है कि देश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस विषय पर उत्तराखंड को केस स्टडी बनाकर शोध चल रहे हैं। दस वर्ष बाद ही इनके नतीजे सामने आएंगे। कुल मिलाकर समान संहिता के पक्ष में एक माहौल बन रहा है। हमने कानून बनने के बाद इसे लागू करने के लिए पुख्ता इंतजाम किए। 7500 से अधिक कामन सर्विस सेंटर और आनलाइन पोर्टल के जरिये इस संहिता में विवाह पंजीकरण की व्यवस्था की। चूंकि यह प्रत्येक धर्म पर समान रूप से लागू है, इसलिए सभी धर्मावलंबियों से अनुरोध किया कि वे इसे अपनाएं। लोग बहुत गर्मजोशी से इसे अपना भी रहे हैं। अब तक कोई पांच लाख विवाह-पंजीकरण हो चुके हैं। हर दिन 1400 से ज्यादा पंजीकरण हो रहे हैं। हर नव विवाहित जोड़ा अब पंजीकरण करवा रहा है। जो लोग लिव-इन रिश्ते में रह रहे हैं, वे भी पंजीकरण करवा रहे हैं। विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार, बहुविवाह और एकतरफा तलाक, बेटी और बेटे को समान संपत्ति का अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे तमाम मामले इस कानून की जद में आ गए हैं। इसलिए भविष्य में ये सभी मामले समान नागरिक संहिता के तहत ही लड़े जाएँगे। इस कानून का सबसे बड़ा लाभ महिलाओं को मिलेगा। जहां उन्हें परिवार के स्तर पर सुरक्षा मिल रही है, वहीं पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिल रहा है। फिर लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को भी भविष्य की गारंटी चाहिए। यह कानून अवैध रूप से एकाधिक विवाह, मनमाने तलाक जैसी कुरीतियों से भी महिलाओं को सुरक्षा देता है। जाहिर है, इससे सामाजिक समानता की यह खुलेगी। हमने पिछले एक साल में देखा है कि लगभग हर धर्म के लोगों, खासकर युवा वर्ग ने इस कानून का खुलकर समर्थन किया है। हालांकि जिस पैमाने पर इस कानून को लेकर जागरूकता फैलाई जानी चाहिए थी, वह नहीं हो पाया, इसलिए हम अब से 27 जनवरी को स्थायी तौर पर सामाजिक चेतना और न्याय के उत्सव के रूप में मना रहे हैं। हम इस कानून को फाइलों से निकालकर समाज के बीच ले जाना चाहते हैं। इसमें प्रशासन, विधि जगत, शिक्षण संस्थानों और युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। चूंकि हर युग में युवा ही परिवर्तन के औजार होते हैं, इसलिए हम चाहते हैं कि वे इसका बीड़ा उठाएँ। अभी ते ये एक शुरूआत है। आने वाले वर्षों में वे देश की तस्वीर बदल सकते हैं। कुल मिलाकर, यह कानून सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और समानता की मजबूत नींव है। इसका वास्तविक लाभ आने वाली पौड़ियों को मिलेगा। पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड मुख्यमंत्री