2026-03-26 18:12:30
हर वर्ष आने वाला श्रीरामनवमी का पावन पर्व केवल भगवान श्रीराम के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज को उसकी आत्मा—समरसता, समानता और मानवीय संवेदनाओं की याद दिलाने का अवसर भी है। भगवान राम को यदि “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा गया है तो उसका कारण केवल उनका आदर्श शासन या व्यक्तिगत चरित्र नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के प्रति उनका समावेशी और आत्मीय दृष्टिकोण भी है। राम का जीवन इस बात का सजीव उदाहरण है कि सामाजिक समरसता केवल विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरी हुई जीवन-शैली है। जब हम रामायण के विभिन्न प्रसंगों को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि राम ने समाज के तथाकथित “हाशिए” पर खड़े लोगों को भी समान सम्मान और अपनत्व दिया।
रामनवमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा में रचे-बसे उन मूल्यों का पुण्य स्मरण है, जो हमें जोड़ते हैं जैसे सामाजिक समरसता, समानता और मानवीय मूल्य। भगवान राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” इसलिए कहा गया, क्योंकि उन्होंने जीवन के हर स्तर पर मर्यादा के साथ-साथ सामाजिक न्याय और समावेशिता को भी स्थापित किया। उनका चरित्र हमें यह सिखाता है कि समाज का सही मायने में उत्थान तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को समान दृष्टि से देखा जाए। रामचरितमानस में वर्णित अनेक प्रसंग इस समरसता के सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से निषादराज गुह, केवट और शबरी के प्रसंग ऐसे हैं, जो उस समय की सामाजिक संरचना में व्याप्त भेदभाव को चुनौती देते हैं और मानवता के सर्वोच्च आदर्शों को सामने रखते हैं।
निषादराज गुह: सामाजिक समरसता और समानता का उदाहरण
वनगमन के समय जब राम अयोध्या से प्रस्थान करते हैं, तब निषादराज गुह उन्हें जिस आत्मीयता से अपनाते हैं, वह केवल एक मित्र का स्वागत नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उद्घोष है। राम भी उन्हें गले लगाकर यह संदेश देते हैं कि सच्चा संबंध जन्म या जाति से नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता से बनता है। राम यहाँ ऊंच-नीच का किसी भी तरह का भेद नहीं करते। तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है—
“प्रेम मगन निषाद रघुराई।
पूछत कुशल निकट बैठाई॥”
यहां राम और निषादराज के बीच कोई ऊंच-नीच नहीं, केवल स्नेह और विश्वास है। राम का उन्हें गले लगाना उस समय की जातिगत दूरियों को तोड़ने वाला क्रांतिकारी संदेश है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्चा संबंध हृदय से बनता है, न कि सामाजिक श्रेणियों से भगवान राम सामाजिक समरसता का सबसे बढ़ा संदेश दिया है।
केवट प्रसंग: भक्ति, सेवा और सामाजिकता
केवट का प्रसंग भारतीय जनमानस में विशेष स्थान रखता है। जब राम गंगा पार करने के लिए नाव मांगते हैं, तो केवट विनम्रता से कहते हैं कि पहले वे उनके चरण धोना चाहते हैं—
“मागी नाव न केवट आना।
कहइ तुम्हार मरम मैं जाना॥”
“चरन कमल रज कहुँ सबु कहई।
मानुष करनि मोरि नाव न रहई॥”
केवट का यह संवाद केवल भक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रतीक है। वह अपनी भाषा में यह व्यक्त करता है कि वह भी आत्मसम्मान और समझ रखता है। राम का इस प्रेम और आग्रह को स्वीकार करना यह दर्शाता है कि वे हर व्यक्ति के भाव को सम्मान देते हैं, चाहे वह किसी भी वर्ग से हो।
शबरी प्रसंग: भक्ति में समरसता की पराकाष्ठा
शबरी का प्रसंग समरसता का सबसे भावपूर्ण उदाहरण है। शबरी, जो समाज के उपेक्षित वर्ग से आती हैं, अपने प्रेम और भक्ति से राम का स्वागत करती हैं। वे अपने द्वारा चखे हुए बेर राम को अर्पित करती हैं—
“बरन बरन फल रामहि दीन्हा।
प्रेम सहित प्रभु मन अति लीन्हा॥”
राम बिना किसी संकोच के उन बेरों को स्वीकार करते हैं। यह दृश्य उस समय की सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध एक सशक्त संदेश है, जहां प्रेम सर्वोपरि है, वहां कोई भेदभाव नहीं टिकता। यहाँ पर भी राम जाति-पाति का भेदभाव नहीं करते, इसलिए राम के आदर्श आज भी पूजनीय हैं।
श्रीराम का संदेश: आज के समाज के लिए प्रासंगिकता
आज जब हम 21वीं सदी में खड़े हैं, तब भी सामाजिक असमानता और भेदभाव की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ऐसे समय में राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि समरसता केवल नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवहार से आती है।
श्रीरामनवमी का पर्व हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम राम के आदर्शों को केवल पूजा तक सीमित रख रहे हैं, या उन्हें अपने जीवन में उतार रहे हैं? निषादराज की मित्रता, केवट की सेवा-भावना और शबरी की भक्ति—ये केवल कथाएं नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के सूत्र हैं। राम केवल एक देवता नहीं है, बल्कि एक विचार हैं। एक सतत् विचार हैं जिससे सनातन की मंदानिकी निरंतर प्रवाहमान है। राम एक ऐसे विचार हैं जो समाज को जोड़ते हैं, विभाजित नहीं करते। रामनवमी का यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर के भेदभाव को त्यागें और समाज में समरसता की स्थापना करें, क्योंकि राम सामाजिक समरसता, नैतिक मूल्यों और लोकधर्म की स्थापना करते हैं।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार : बृजेश कुमार द्विवेदी